Monday 28 December 2009

आजकल अपराध और दबदबे का अजीब मेल देखा जा रहा है। सत्तर के दशक में अपराधियों को नेता बनाने का जो पौधा संजय गांधी ने रोपा था वह अब फल देने लगा है। अपराधी नेताओं और उनकी दूसरी पीढ़ी समाज को धकिया कर रसातल तक ले जाने की अपनी मुहिम पर पूरे ध्यान से लगी हुई है। इस हफ्ते के अखबारों में दो खबरें ऐसी हैं, जो सामाजिक पतन की इबारत की तरह खौफनाक हैं और दोनों ही सामाजिक जीवन में घुस चुके अपराध के समाजशास्त्र की कहानी को बहुत ही सफाई से बयान करती हैं। पहली तो हरियाणा की खबर, जहां 19 साल पहले बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रख चुके एक अधेड़ पुलिस अफसर ने एक 14 साल की बच्ची के साथ जबरदस्ती की और जब लड़की ने आत्महत्या कर ली तो उसके परिवार वालों को परेशान करता रहा। 19 साल के अंतराल के बाद जब अदालत का फैसला आया तो उस अफसर को छह महीने की सजा हुई। अब पता लग रहा है कि उस अफसर को अपनी हुकूमत के दौरान राजनेता ओम प्रकाश चौटाला मदद करते रहे, उसे तरक्की देते रहे और केस को कमजोर करके अदालत में पेश करवाया। जानकार बताते हैं कि केस को इतना कमजोर कर दिया गया है कि हाईकोर्ट से वह अपराधी अफसर बरी हो जाएगा। राजनेता की मदद के बिना कानून का रखवाला यह अफसर अपराध करने के बाद बच नहीं सकता था।

दूसरा मामला उत्तर प्रदेश के एक विधायक के बेटे का है। यह बददिमाग लड़का दिल्ली के किसी शराबखाने में घुसकर गोलियां चलाकर भाग खड़ा हुआ। उसी शराबखाने में बीती रात उसकी बहन गई थी और अपना पर्स भूलकर चली आई थी। उसी पर्स को वापस लेने अपनी बहन के साथ गया लड़का गोली चलाकर रौब गांठना चाहता था। उत्तर प्रदेश की सरकारी पार्टी के विधायक का यह लड़का दिल्ली पुलिस के हत्थे चढ़ गया और आजकल पुलिस की हिरासत में है। यह दो मामले तो ताज़े हैं। ऐसे बहुत सारे मामले पिछले कुछ वर्षो में देखने में आए हैं। जेसिका लाल और नीतीश कटारा हत्याकांड तो बहुत ही हाई प्रोफाइल मामले हैं, जिसमें नेताओं के बच्चे अपराध में शामिल पाए गए हैं। ऐसे ही और भी बहुत सारे मामले हैं, जिनमें नेताओं के साथ-साथ अफसरों के बच्चे भी आपराधिक घटनाओं में शामिल पाए गए हैं। अफसोस की बात यह है कि जब ये बच्चे अपराध करते हैं तो उनके ताकतवर नेता और अफसर बाप उन्हें बचाने के लिए सारी ताकत लगा देते हैं। और, यही सारी मुसीबत की जड़ है।

समाज को इन अपराधी नेताओं और अफसरों ने ऐसे मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से वापसी की डगर बहुत ही मुश्किल है। यह मामला केवल उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पंजाब तक ही सीमित नहीं है। इस तरह की प्रवृत्ति पूरे देश में फैल चुकी है। अगर इस प्रवृत्ति पर फौरन काबू न कर लिया गया तो बहुत देर हो जाएगी और देश उसी रास्ते पर चल निकलेगा, जिस पर पाकिस्तान चल रहा है या अफ्रीका के बहुत सारे देश उसी रास्ते पर चलकर अपनी तबाही मुकम्मल कर चुके हैं। लेकिन अपराधी तत्वों का दबदबा इतना बढ़ चुका है कि इन अपराधियों को काबू कर पाना आसान बिलकुल नहीं होगा। हालात असाधारण हो चुके हैं और उनको दुरुस्त करने के लिए असाधारण तरीकों का ही इस्तेमाल करना होगा। नेहरू के युग में यह संभव था कि अगर अपराधी का नाम ले लिया जाए तो वह दब जाता था, डर जाता था और सार्वजनिक जीवन को दूषित करना बंद कर देता था। जवाहर लाल नेहरू ने एक बार अपने मंत्री केशव देव मालवीय को सरकार से निकाल दिया था, क्योंकि दस हजार रुपए के किसी घूस के मामले में वे शामिल पाए गए थे। उन्होंने एक बार एक ऐसे व्यक्ति को गलती से टिकट दे दिया, जिसके ऊपर आपराधिक मुकदमे थे। जब मध्य भारत में चुनावी सभा के दौरान उनको पता चला कि यह तो वही व्यक्ति है, जिसे उन्होंने गिरफ्तार करवाया था। नेहरू जी ने उसी चुनावी मंच से ऐलान किया कि इस आदमी को गलती से टिकट दे दिया गया है, उसे कृपया वोट मत दीजिए और उसे चुनाव में हरा दीजिए। वह आदमी कोई मामूली आदमी नहीं था। मंत्री रह चुका था, रजवाड़ा था और आज के एक बहुत बड़े नेता का पूज्य पिता था। आज जब हम देखते हैं कि कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक पार्टियां ऐसे लोगों को टिकट देना पसंद करती हैं जो अपनी दबंगई के बल पर चुनाव जीत सकें तो जवाहर लाल नेहरू के वक्त की याद आना स्वाभाविक भी है और जरूरी भी। जाहिर है कि नेहरू ने राजनीतिक जीवन में जिस शुचिता की बुनियाद रखी थी, उनके वंशज संजय गांधी ने उसके पतन की शुरुआत का उद्घाटन कर दिया था। बाद में तो सभी पार्टियों ने वही संजय गांधी वाला तरीका अपनाया, जिसके चलते आज राजनीतिक व्यवस्था गुंडों के हवाले हो चुकी है। अगर यही व्यवस्था चलती रही तो मुल्क को तबाह होने का खतरा बढ़ जाएगा। इस हालत से बचने के लिए सबसे जरूरी तो यह है कि अपराधी नेताओं और अफसरों के दिमाग में यह बात बैठा दी जाए कि जेसिका लाल और नीतीश कटारा के हत्यारों की तरह ही हर बददिमाग सिरफिरे को जेल में ठूंस देने की ताकत कानून में है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कानून का इकबाल बुलंद करने वाले तक भी कई मामलों में शामिल पाए जाते हैं। ऐसे हालात में घूम-फिर कर ध्यान मीडिया पर ही जाता है। पिछले दिनों जितने भी हाई प्रोफाइल मामलों में न्याय हुआ है, उसमें मीडिया की भूमिका अहम रही है। इस बार भी हरियाणा वाले अपराधी अफसर के मामले में मीडिया ने ही सच्चाई को सामने लाने का अभियान शुरू किया है और उम्मीद है कि रुचिका की मौत के लिए जिम्मेदार अपराधी को माकूल सजा मिलेगी।

Saturday 26 December 2009

उत्तर प्रदेश का अघोषित आपातकाल

माना की चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है होता है और उत्तर प्रदेश में बसपा जो की आम जनता पर अपनी पकड़ तेजी से खोती जा रही है, जिसकी मुखिया मायामुर्ती सिर्फ पत्थर की देवी होती जा रही है, जिन्हे भूखी मरती जनता, खाद के लिए लाठिया खाते लोग, खेतो में गन्ना जलाते किसान और रोज लुटती दलित और गरीब औरतो की इज्ज़त नहीं दिखाई देती, जहा मायामुर्ती के प्यारे विधायक कोई पुलिस वाले का खून कर रहा है तो कोई अभियंता का , जहा इमानदार अधिकारी आत्महत्या कर रहे है, रोटी केलिए लोग बच्चे बेच रहे है...वो घमंडी महिला और उसके रक्त पिपासु सिपाह सालारो ने सरकारी अधिकारियो ,को भी वफादार कहे जाने वाले जानवर की नस्ल बना दी है...जहा धनञ्जय सिंह, ब्रिजेश सिंह मुख्तार अंसारी, अफजाल अंसारी, हरिशंकर तिवाज्री, गुड्डू पंडित और ऐसे ही कई माफिया और उनके रिश्तेदार चुनाव लड़ रहे है वही विरोधियो को डराने की ऐसी सस्ती चाले चलना क्या शोभा देता है...
मंत्री प्रधानो को फ़साने की धमकिया देता है...भूलिए मत मायामूर्ति जी सत्ता किसी की बपौती नहीं है और कल आप के साथ भी यही हो सकता है....कब कुर्सी नीचे से खिसक जाएगी और तारे दिख जायेंगे पता नहीं चलेगा...ये तानाशाही छोडिये और अगर विश्वास है तो नैतिक चुनाव लड़िये..

आज जिस तरह से उत्तर प्रदेश के विधान परिषद् चुनावो में , विधान सभा उपचुनावों की तरह लेखपाल से लेकर डीएम तक का खुला दुरुपयोग हो रहा है, जिस तरह से चुनाव हरने वाले जिलो से अधिकारियो का थोक के भाव ट्रान्सफर किया जा रहा है उससे अधिकारियो मीक तरह का डर व्याप्त हो गया है, हर तरफ एक निराशा , एक डर, एक आतंक का माहौल है, हर अधिकारी, हर जनप्रतिनिधि सर्कार और मायामुर्ती के पैसकमाने की हवास पूरी करने की मशीन बन चूका है मुझे नहीं पता की प्रदेश का भविष्य क्या होगा..जिस तरह सारी पार्टी के नेता बसपा के नेताओं और अधिकारियो के पद और सत्ता के दुरुपयोग, उनकी धमकियों से परेशां है उससे उम्मीद नहीं की प्रदेश में बीना केन्द्रीय दल के कोई चुनाव निष्पक्छ और निष्कलंक हो सकता है..जिस तरह भाजपा, कांग्रेस, सपा से लेकर अपना दल और इंजपा तक सर्कार से परेशां है उससे कही कही उत्तर प्रदेश में अघोषित तानाशाही लगी हुई है.

Tuesday 22 December 2009

संदर्भ : नये राज्य

बचपन में मुहावरा सुना, आग से खेलना. आशय था, ऐसे संकट-सवाल, जो आग की तरह हैं, जलाने, नष्ट करने की क्षमता से संपन्न. उन सवालों से व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और दुनिया बचे. फूंक-फूंक कर कदम उठाये. लोक अनुभव से निकले, इस मुहावरे में बरजने का भाव है. आगाह करने का, सावधान रखने का, ताकि कोई आग से मत खेले. नहीं तो जलना-भस्म होना नियति है.

देश में अनंत ज्वलंत मुद्दे हैं. संकट और चुनौतियां हैं. पर हमारी राजनीति आग से ही खेलना चाहती है. लेकिन आग लगाना आसान है, बुझाना कठिन. नेता गद्दी, कुर्सी और सत्ता के लिए देश को तबाह करने पर तुले हैं. तेलंगाना बनाने की घोषणा हुई. बगैर सोचे-समङो. और देश में एक कठिन मुद्दा खड़ा हो गया है. पैशन और इमोशन (आवेग और भावना) से जुड़ा. एक भूल ने देश में नया बवंडर खड़ा कर दिया है.10 नये राज्यों की मांग दो दिनों के अंदर हो गयी है. कूचबिहार, बोडोलैंड, पूर्वाचल, बुंदेलखंड, विदर्भ, रायलसीमा, मिथिलांचल, तुलुनाडु. ये आठ हैं. अवध, भोजपुर और न जाने कितने और राज्य चाहिए. मायावती ने उत्तर प्रदेश विभाजन की मांग कर दी है. जसवंत सिंह गोरखालैंड के प्रवक्ता बन गये हैं. ओड़िशा-छत्तीसगढ़ के पश्चिमी जिलों को मिला कर एक नये राज्य की मांग भी हुई है. कच्छ और राजस्थान के विभाजन की चर्चा भी हवा में है.

क्या कभी किसी ने सोचा, यह मुल्क जा कहां रहा है? भाषाई आंदोलन, बाल ठाकरे की मराठी अस्मिता, अब राज ठाकरे का मराठी मानुष, भिंडरावाले का आंदोलन, अयोध्या प्रकरण, सांप्रदायिक सवाल, जातिगत मुद्दे जैसे सवालों से इस देश में समय-समय पर जो आग लगी, उससे मुल्क ने क्या सीखा? क्या इन भावात्मक सवालों (आग) से कोई सबक मिला? कितना झुलसा है, यह देश, जिस देश कि चौहद्दी पर बार-बार चीन अपनी ताकत का एहसास कराये, आतंकवाद की चुनौती लगातार बनी हो, पचासों करोड़ नितांत गरीब, किसी तरह जी रहे हों, प्रधानमंत्री के शब्दों में, जहां आजादी के बाद की सबसे बड़ी चुनौती नक्सल समस्या मौजूद हो, वहां एक नया पेंडोरा बॉक्स (भानुमती का पिटारा) खोलने के कदम को आप क्या कहेंगे ?

12 दिसंबर की खबर है प्रतिबंधित उल्फ़ा के नेता परेश बरूआ ने फ़िर संप्रभुता की बात उठायी है. वे असम में जनमत संग्रह चाहते हैं. कश्मीर की आग, आज भी धधक रही है. वहां भी विदेशी ताकतें चाहती हैं, जनमत संग्रह हो. साठ के दशक में तमिलनाडु से ऐसी मांग उठी. उस आवाज से देश स्तब्ध था. राज्यों में भाषा, क्षेत्र, नस्ल, संस्कृति ओद की संकीर्ण निष्ठाएं गंभीर रूप ले सकती हैं. मधु लिमये ने चेताया था, आत्मनिर्णय के छद्म सिद्धांत का प्रचार करनेवाला सोवियत संघ टुकड़े-टुकड़े हो चुका है. पर क्यों इस मुल्क के राजनेता बार-बार आग में जलने को आतुर हैं ?

तर्क यह है कि छोटे राज्य बनें. विकेंद्रीकरण हो. ताकि सुचारु शासन चले. यह सैद्धांतिक पक्ष है. आज यथार्थ क्या है? छोटे राज्य हों या बड़े राज्य, चलानेवाले महत्वपूर्ण हैं. अंगरेजी में कहते हैं- संस्था गढ़नी है, तो सबसे पहले ‘मैन’ (आदमी) चाहिए.

आदमी से आशय काबिल लोग. सक्षम लोग. मूलत राजनीति में चरित्र चाहिए. चरित्र और सिद्धांत से रहित दलों की आजकल बाढ़ आ गयी है. किसी में कोई राष्ट्रीय सपना बचा नहीं है. न देश का. न समाज का. हां अपने उद्धार का सपना जरूर है,

इसलिए परिवारों के दल बनाये हैं. ऐसे ही दल अगर छोटे राज्यों का भविष्य तय करेंगे, तो यह देश कहां पहुंचेगा? .

जनता पार्टीने घोषणा पत्र में कहा था कि वह छोटे राज्यों की हिमायती है. सत्ता का विकेंद्रीकरण चाहती है.चंद्रशेखरजी ने एक प्रसंग कहा, मोरारजी और चरण सिंह इच्छुक थे, छोटे राज्य बनाने के लिए. पर हमने विरोध किया. तब मोरारजी प्रधानमंत्री थे. चरण सिंह गृह मंत्री. चंद्रशेखरजी ने कहा, न आप पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं, न चौधरी साहब, सरदार पटेल. न उस युग के तपे-तपाये नेता राज्यों में हैं. तब ’50 और ’60 के दशकों में भाषाई प्रांत बनाने में कितना खून-खराबा हआ ? विद्वेष फ़ैला ? इस आग को, जब पंडितजी-पटेल जैस लोग नियंत्रित नहीं कर सके, तो क्या आप लोग कर पायेंगे? पहले यह तय कर लीजिए, तब कदम उठाइए. जयप्रकाशजी भी तब छोटे राज्यों के पक्षधर थे. चंद्रशेखरजी का यह तर्क सबको जंचा. बात आगे नहीं बढ़ी.

अब स्थिति क्या हो गयी है? सत्ता में बैठने के लिए कोई भी समझौता? कोई भी मांग मान लेना? चंद्रशेखर राव के अनशन प्रसंग को गहराई से सोचा गया? कैसे गृह सचिव बयान देते हैं, और फ़िर वापस लेते हैं? क्या यही प्रक्रिया है? आंध्र में सड़कों पर अलग-अलग गुटों में जंग होने लगती है. वकीलों के बीच. नेताओं के बीच. और पूरा राज्य आंदोलित और अस्थिर हो जाता है. जब आंध्र बना, तब विशाल आंध्र की मांग हई थी. कहा गया कि मद्रास राज्य में तेलुगु भाषियों के साथ न्याय नहीं हो रहा है. पोट्टी श्रीरामुलु ने अनशन किया. मान लिया गया कि देश में शासन की इकाई भाषाई राज्य होंगे. और फ़िर आंध्र बना. अब वह आंध्र कितने हिस्सों में बंटेगा? एक ही समूह, जाति, भाषा, संस्कृति, पहचान के लोग हैं. अब क्या जाति पर, कुल या गोत्र पर और अंतत परिवार के आधार पर यह देश खंड-खंड होगा?

याद करिए, संयुक्त महाराष्ट्र की बात उठी. गुजरात अलग हआ. आइक्या केरल की चर्चा हई. मलयाली भाषी लोगों के लिए राज्य बना. गुजरात और हरियाणा अस्तित्व में आये. 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग ने इसी आधार पर राज्यों को स्वरूप दिया. झारखंड में पलामू के वरिष्ठ पत्रकार थे, रामेश्वरमजी. उन्होंने अभियान चलाया. झारखंड के उस इलाके को केंद्रशासित अंचल बनाने का. आज तक चंडीगढ़ की समस्या नहीं सुलझ सकी. पंजाब आंदोलन में यह एक बड़ा मुद्दा था. क्या कुछ नहीं देखा पंजाब और इस मुल्क ने? आतंकवाद, एक प्रधानमंत्री की हत्या, राजीव-लोंगोवाल करार, पंजाब और हरियाणा के बीच के विवाद. महाराष्ट्र - कर्नाटक का दशकों पुराना सीमा विवाद. इसके लिए बना महाजन आयोग की रिपोर्ट. पंजाब सीमा विवाद पर शाह कमीशन की रिपोर्ट. किस ऐसे संवेदनशील मुद्दा को हमारे नेता सुलझा सके हैं? अनगिनत विवादास्पद और विस्फोटक रपटें पड़ी हैं. पुराने घावों और नासूर को मत हरा करिए. मामूली मुद्दों पर भी साहस के साथ कदम उठाने की कूवत नहीं है आज की राजनीति में, पर आग लगाने में माहिर हैं. पहले क्षेत्रीय दलों के नेताओं के पास भी राष्ट्रीय दृष्टि थी. आज प्रादेशिक दृष्टिकोण है. संकीर्ण दृष्टिकोण है. परिवार ही पार्टी है. ऐसे लोग क्या इस देश में आग बुझा पायेंगे? मधु लिमये ने लिखा था, "भारत की राष्ट्रीय एकता प्रदीर्घ प्रयत्नों के बाद साकार हई है. मेरी इच्छा है कि कोई काम ऐसा न किया जाये कि जिससे यह एकता खतरे में आ जाये"

मैं विकेंद्रीकरण का समर्थक हं. लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हर मामले में केंद्र के पर काट कर उन्हें प्रांतिक स्वायत्तता के नाम पर राज्यों पर चिपकाना. अपने अधिकारों में जिला पंचायत, महानगरपालिका, नगरपालिका तथा ग्राम पंचायतों को साङोदारी देने के लिए राज्य सरकारें कहां तैयार हैं.’्

अखिल भारतीय दल की विरूदावली क्यों? फ़िर केंद्र की भी क्या जरूरत है? इंका, जनता, माक्र्सवादी कम्युनिस्ट ओद दलों को बरखास्त कर, अकाली, द्रमुक, तेलगुदेशम, अस-गण परिषद ओद विशुद्ध प्रादेशिक दलों को ही रहने देना उचित होगा! पर ऐसा होने से भारतीय गणराज्य की वही दुर्गति होगी, जो मराठा साम्राज्य की हई थी.’

तेलंगाना प्रकरण में एक नयी आवाज भी है. हैदराबाद को लेकर झगड़ा है. अगर बंटवारा हआ, तो यह शहर किसके पास रहेगा? भौगोलिक अधिकार तो तेलंगाना का है. पर इसे विकसित करने में पैसा लगाया है , अन्य तेलुगु भाषियों ने भी. चंडीगढ़ विवाद अब तक अनसुलझा है. 1946 में कलकत्ता को लेकर दंगे हए. इजरायली और फ़िलिस्तीनियों के बीच जेरूसलम को लेकर झगड़ा आज भी है. मुंबई पर राज ठाकरे हक जता रहे हैं. शहरों को लेकर यह झगड़ा क्यों होता है? इतिहास में संपन्न शहरों पर बाहरी हमलों की नजीर पहले भी है. चूंकि शहर, संपन्नता के प्रतीक हैं. वहां बड़ा कारोबार है, उद्योग-धंधा है. अवसर हैं. सपने हैं. इसलिए विवाद है. इस विवाद का हल है, पुरुषार्थ और कर्म.

"अगस्टस सीजर का एक बयान पढ़ा, मुङो रोम मिला, ईंट के शहर के रूप में, मैंने इसे जब छोड़ा, तो यह संगमरमर का शहर था. ईंट से संगमरमर की इस यात्रा के पीछे आशय उद्यम से है, परिश्रम से है, संकल्प से है, नया कुछ करने से है."

हम छोटे-छोटे विकेंद्रित सुंदर शहर नहीं बना सकते, जहां उद्योग-धंधों के अवसर हों, शहरी जीवन हों? अब तो भारत के स्तर पर नगर विकास के लिए बड़ी राशि मिल रही है, केंद्र से. पुरुषार्थ, कर्म और श्रम से नयी मुंबई और नये हैदराबाद बन सकते हैं. हर राज्य में. पर ऐसे सोच के लोग राजनीति में हैं कहां?

आज सुपरपावर चीन के मुकाबले भारत को खड़ा होना है, तो भारत को आग लगानेवाले नेता नहीं चाहिए. बल्कि स्टेट्समैन चाहिए. कितना संकट है, देश के सामने? ऊर्जा संकट, पर्यावरण संकट, घटता खाद्यान्न, कानून -व्यवस्था की आंतरिक चुनौतियां, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद वगैरह. प्रो आर्नल्ड टायनबी ने लिखा था, कोई भी सभ्यता अपनी चुनौतियों को हल करने का कितना सामथ्र्य रखती हैं, इसी आधार पर बढ़ती है. जब कोई सभ्यता अपनी चुनौतियों का हल न ढ़ंढ़ पाये, तो वह चूकने लगती है. क्या बाहरी चुनौतियां कम हैं कि घर के अंदर ही हमारे नेता आग लगाने लगे?

Monday 21 December 2009

देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को 1950 में राष्ट्रमंडल सम्मेलन में भाग लेने के लिए विदेश जाना पड़ा तो उन्होंने संसद से यह कहते हुए इजाजत मागी कि बहुत प्रयास के बाद भी वह सम्मेलन की तिथि बदलवाने में सफल नहीं हो सके। उन्हें खेद है कि संसद के सत्र के दौरान देश से बाहर जाना पड़ रहा है। संसद के प्रति प्रधानमंत्री, उनके मंत्रियों तथा सासदों में जो निष्ठा थी, उसका लगातार क्षरण होता गया। अब तो महत्वपूर्ण मामलों जैसे महंगाई पर चर्चा के दौरान सदस्यों की न्यूनतम उपस्थिति भी सुनिश्चित नहीं हो पाती। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो अपने अब तक के कार्यकाल में शायद ही संसद के किसी सत्र के दौरान विदेश यात्रा पर न गए हों। यही नहीं, वह दिल्ली में रहते हुए भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर संवाद करने से बचते हैं। दिल्ली में होते हुए भी वह गन्ना किसानों की समस्या पर विपक्ष के साथ वार्ता में शामिल नहीं हुए। उनके 'विदुर' प्रणब मुखर्जी को यह दायित्व संभालना पड़ा। जिस दिन देश 26/11 के शहीदों को श्रद्धाजलि अर्पित कर रहा था, वह अमेरिकी राष्ट्रपति की दावत उड़ा रहे थे और जब लिब्रहान आयोग का प्रतिवेदन सदन में पेश करने की अपरिहार्यता से सरकार जूझ रही थी वह मंत्रिमंडल का नेतृत्व करने के लिए उपस्थित नहीं थे। ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख किया जा सकता है, जब प्रधानमंत्री के स्थान पर 'विदुर' उत्तरदायी बनकर खड़े दिखाई पड़ते रहे हैं।

'इंडिया अनबाउंड' के लेखक गुरुचरण दास ने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तुलना भीष्म पितामह से की। जिस प्रकार भीष्म पितामह 'धर्म' जानते हुए भी उस पर होने वाले प्रहार पर मौन रहे उसी प्रकार मनमोहन सिंह भी मौन धारण किए हुए हैं। उनके मौन रहने के उदाहरणों की लंबी फेहरिस्त है, चाहे संचार मंत्री राजा का प्रसंग हो या फिर उनके गृहमंत्री चिदंबरम द्वारा लश्करे तैयबा के चार आतंकियों के साथ महाराष्ट्र की एक युवती इशरत जहा के तीन साल पूर्व अहमदाबाद के पास मुठभेड़ में मारे जाने की घटना पर भारत सरकार द्वारा अदालत में दाखिल शपथपत्र का बदला जाना। घटना के तत्काल बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जो शपथपत्र दाखिल किया उसमें तीन मुख्य बिंदु थे। उनका लश्करे तैयबा से संबंध था, उनकी गतिविधियों की पूर्व सूचना सरकार के पास थी तथा घटना की किसी भी अन्य एजेंसी से जाच कराने की आवश्यकता नहीं है। अब परिवर्तित शपथपत्र में पूर्व में दी गई सूचनाओं को 'रूटीन' सूचना बताकर इन तीनों तथ्यों को उलट दिया गया है। उन्होंने जिस दिन नया शपथपत्र 'स्वीकृत' किया उसी दिन सेंट पीटर्सबर्ग से लौटते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधिकारियों ने पत्रकारों से कहा कि इशरत जहा के लश्करे तैयबा से संबंध होने के असंदिग्ध प्रमाण हैं।

क्वात्रोची मामले में सरकार के 'कोई सबूत नहीं' के दावे पर सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह का कथन देखिए, स्विट्जरलैंड की सर्वोच्च अदालत में मुकदमा लड़कर मैं स्वयं सारे सबूत लाया था, जिसके आधार पर क्वात्रोची के खिलाफ रेड कार्नर एलर्ट जारी हुआ और इंग्लैंड के बैंक में जमा उसका चालीस करोड़ रुपया जब्त कर लिया गया था। प्रधानमंत्री ने इस संदर्भ में किस 'धर्म' का निर्वहन किया है, इस पर टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है। सीबीआई ने 12 मुकदमे वापस ले लिए हैं और 21 को वापस लेने का आवेदन कर रही है। क्यों? तीन वर्ष पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने संसद पर हमले के आरोपी अफजल को मृत्युदंड दिया। उसकी पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो गई है और सजा पर अमल न किए जाने पर सर्वोच्च न्यायालय ने 'फासी का सजायाफ्ता सरकार की धरोहर नहीं' कहकर सरकार को 'धर्म पालन' की नसीहत भी दी, लेकिन भीष्म पितामह पर कोई असर नहीं हुआ।

मनमोहन सिंह मिस्त्र के शर्म-एल शेख में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ ऐसा संयुक्त बयान जारी कर आए जिस पर सारे देश का सिर शर्म से झुक गया। संसद में फजीहत हुई। उनके 'विदुर' प्रणब मुखर्जी भी बचाव में कामयाब नहीं हो पाए। निश्चय ही वह भ्रष्टाचार से क्षुब्ध हैं। जब भी कहीं बोलने का अवसर मिलता है तो भ्रष्टाचार को देश का सबसे बड़ा रोग बताते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपी को मंत्रिमंडल में पुन: शामिल कर उसके पुराने विभाग का दायित्व सौंप देते हैं। देश के संसाधनों पर गरीबों के बजाय मुसलमानों का पहला हक बताकर उन्होंने उसी प्रकार का आचरण किया जैसा भीष्म ने शस्त्र उठाकर किया था। महात्मा गाधी की सादगी में उनकी घोषित आस्था है, लेकिन जब उनके मंत्री सरकारी खर्च पर फाइव स्टार होटलों में ठहरे हुए थे, तब उन्हें रोकने का प्रयास नहीं किया। समाचार पत्रों में खुलासे के बाद उनके 'विदुर' प्रणब मुखर्जी को आगे आना पड़ा और 'मवेशीबाड़ा' जैसी अशोभनीय अभिव्यक्ति करने वाला मंत्री उनके पास तक नहीं फटका।
अपने प्रथम प्रधानमंत्रित्वकाल में तेल के खेल मामले में नटवर सिंह को क्लीनचिट देने के बाद त्यागपत्र क्यों और किसके कहने से मागा, इसके ब्यौरे में अब जाने की आवश्यकता नहीं रह गई है क्योंकि उसका खुलासा विस्तार से हो चुका है। एक-एक कर पड़ोसी देश हमारे शत्रु खेमे के प्रभामंडल में जा रहे हैं और हम केवल अमेरिका से गुहार भर कर संतुष्ट हो जाते हैं। और तो और, प्रधानमंत्री कार्यालय से विभागों को जारी निर्देशों को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है। तीस नवंबर तक मंत्रालयों से कार्य निष्पादन के बारे में मागी गई रिपोर्ट का किसी ने उत्तर नहीं दिया। मनमोहन सिंह के शासनकाल में सीबीआई को काग्रेस ब्यूरो आफ इमप्लीमेंटेशन की संज्ञा दी जा रही है। ऐसे दर्जनभर से अधिक संगीन मामले हैं, जिनमें सीबीआई ने अपने पूर्व शपथपत्र के उलट संशोधित शपथपत्र दाखिल किए हैं। उसके इस चलन पर सर्वोच्च न्यायालय ने 'इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकता' जैसी सख्त टिप्पणी भी की है। लेकिन 'भीष्म' का मौनव्रत कायम है।

महंगाई कहा से कहा पहुंच गई,
पृथकतावादियों की अनियंत्रित हरकतों ने आम आदमी को कानून अपने हाथ में लेने के लिए प्रेरित किया है, आए दिन ट्रेन, बस, सरकारी भवनों को आग लगा देने की घटनाओं को अंजाम देने में लोग हिचक नहीं रहे हैं। क्यों? क्योंकि अपराध के लिए दंड पाने के रास्ते में राजनीतिक हानि-लाभ का लेखा-जोखा प्रक्रिया को या तो निरस्त कर देता है और यदि न्यायालय अड़ जाता है तो उसे बाधित कर ऐसे व्यक्तियों को वीआईपी की श्रेणी में रखकर विशेष सुविधा दी जाती है। गुरुचरणदास ने मनमोहन सिंह को सिर्फ भीष्म पितामह ही कहा है, लेकिन देखा जाए तो उनमें भीष्म के साथ-साथ धृतराष्ट्र के गुण भी हैं। अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें उन्हें दुर्योधन का दोष नहीं दिखाई पड़ता, और 'पांडवों' के लिए दुखी रहकर भी उनको वनवास दिए जाने पर मौन रहते हैं। महाकवि तुलसीदास ने भक्ति में सेवक भावना को सर्वोपरि बताया है। यह कहना कठिन है कि मनमोहन सिंह ने रामचरित मानस पढ़ी है या नहीं, लेकिन उनके भीतर सेवक भावना की गहरी पैठ है। धर्म का मर्म जानने मात्र से धर्मनिष्ठ नहीं हुआ जाता। धर्माचरण करने से ही धर्म के प्रति निष्ठा का सार्थक परिणाम निकलता है। दायित्व के निर्वहन में उनके आचरण से अधर्म को ही बल मिल रहा है।

Sujanya...........

Sunday 13 December 2009

हम भी बनेंगे मुख्यमंत्री! अब हर राजनेता जब प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बनना चाहता है तो हम क्यों न बनें? कहावत है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। यह बहुत ही सार्थक कहावत है। आज के समयानुकूल। हर इंसान को नाम, शोहरत और पैसा चाहिए। जब कुछ खास के पास है तो हम आम लोगों के पास क्यों नहीं? राजनीति से अच्छा आजकल कोई धंधा भी नहीं कि जिसमें सब मिल जाता है। मित्रों! आइए, हम सभी मिलकर एक काम करते हैं- हर मोहल्ले को एक राज्य बनाकर मुख्यमंत्री बना दिया जाए और उस मोहल्ले के हर घर का मुख्य कर्ता विधान सभा का सदस्य। हर मोहल्ले में जो सरकारी जमीन पर पार्क हो, उसे हटाकर वहां विधान सभा का भवन बना दिया जाए। सभी मोहल्ला एक राज्य, जिसमें एक मुख्यमंत्री होगा, कई मंत्री। सभी विधान सभा के सदस्य। जैसे मर्जी, अपना-अपना राज्य चलाया जाए। कैसा लगा मेरा सुझाव? मेरी, आपकी और सबकी महत्वाकांक्षा पूरी हो जाएगी।

अंग्रेजों की चाल ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति का परिणाम यह था कि देश दो टुकड़ों में बंटा। सिंहासन-लोभ और राजनीतिक महत्वाकांक्षा की वजह से महात्मा गांधी भी नेहरू और जिन्ना को रोक नहीं पाए थे और देश विभाजन हुआ, जिसकी पीड़ा आजतक हम सह रहे हैं। देश की आजादी के लिए महात्मा गांधी ने जिस अहिंसा और अनशन के द्वारा अंग्रेजों को कभी परास्त किया था, आज उनके ही अनुयायी इस ताकत को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं- अपने स्वार्थ के लिए। बापू की वर्षो की तपस्या और संघर्ष से प्राप्त आजाद भारत आज टुकड़ों-टुकड़ों में बंट रहा है। मन तो हर आदमी का बंट चुका है, मगर देश का आंतरिक भौगोलिक क्षेत्र भी सत्ता-लोभ से बंट रहा है। जाने अभी और कितने राज्य रूपी टुकड़ों में बंटेगा भारत! तेलंगाना राज्य का गठन होना मात्र एक राज्य के बंटने तक सीमित नहीं है। इसका गठन होना नौ और नए राज्यों के गठन के लिए रास्ता दिखा रहा है। साथ ही देश में आंदोलनों की एक नई श्रंखला शुरू होने जा रही है।

बिहार को दो टुकड़ों में बांटकर एक नया राज्य झारखंड बनाया गया था, अब बिहार के कुटिल राजनेता उत्तर बिहार को अलग कर नया राज्य मिथिलांचल की मांग कर रहे हैं। उसी तरह गोरखालैंड, पश्चिम बंगाल और दार्जिलिंग का हिस्सा, पूर्वाचल, पूर्वी उत्तर प्रदेश, ग्रेटर कूच बिहार, पश्चिम बंगाल और असम का हिस्सा, हरित प्रदेश, पश्चिम उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का हिस्सा, कूर्ग, कर्नाटक, सौराष्ट्र, गुजरात, विदर्भ, महाराष्ट्र आदि अलग राज्य के लिए मांग कर रहे हैं। हमारे बुद्धिजीवी राजनीतिकों की राय है कि देश की तरक्की, विकास, सुधार और सुशासन के लिए राज्यों का छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटना जरूरी है। फिर तो ग्रामसभा, ग्रामपंचायत, नगरपालिका, नगरपंचायत, जो एक तरह की छोटी-छोटी विधानसभाएं ही हैं, इन सबका क्या औचित्य?

असली प्रजातंत्र तो यही है कि अब हर गांव, कस्बे, मोहल्ले को एक नया राज्य बना दिया जाए। भाषा के आधार पर अलग राज्य, परिधान के आधार पर अलग राज्य, भौगोलिक स्थिति के आधार पर अलग राज्य, संस्कृति के आधार पर अलग राज्य, हर सम्प्रदाय के आधार पर अलग राज्य, पुरुषों का एक अलग राज्य, स्त्रियों का एक अलग राज्य, हर पार्टी के वर्चस्व के आधार पर एक अलग राज्य, गरीबों का एक अलग राज्य, अमीरों का एक राज्य, दलितों का एक राज्य, जाति-उपजाति, गोत्र-पिंड-टोटम, देवी-देवता आदि-आदि के आधार पर भी बांट सकते हैं।


छोटे-छोटे राज्यों में बंटकर किसकी साध पूरी होगी? जाने राजनीतिकों की ये सत्ता की भूख देश को कहां लेकर जाएगी। देश की प्रगति के लिए राज्यों का अब और बंटवारा उचित नहीं, बल्कि देश की अखंडता को बनाए रखना जरूरी है। आज देश में गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी, महंगाई, पानी, बिजली, प्राकृतिक आपदा, आतंकवाद, नक्सलवाद, क्षेत्रीयता, हिंसा, बलात्कार, भ्रष्टाचार इत्यादि ऐसे गम्भीर मसले हैं जिससे हर आम और खास नागरिक प्रभावित होता है। आज राजनीतिकों की सत्ता लोलुपता का ही अंजाम है कि देश के इतने टुकड़े हो चुके हैं। फिर भी वो संतुष्ट नहीं हैं, और राज्य का विभाजन नहीं बल्कि इंसानों के विभाजन में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। एक तरफ तो सम्पूर्ण दुनिया में वैश्वीकरण की बात होती है तो दूसरी तरफ देश के भीतर इतना ज्यादा विभाजन। किस-किस प्रकार से बांटते रहेंगे। देश के बाद राज्य के विभाजन में देश का सुंदर भविष्य देखने वाले इन देशभक्त नेताओं से किसकी तरक्की की उम्मीद करें। आश्चर्य है सत्ता पक्ष हो या विपक्ष कैसे किसी राज्य को बांटने के लिए तैयार है।

Saturday 12 December 2009

सोच रहा हु क्यों ना अनशन करू अपने गाँव को स्टेट, टोला को कैपिटल और खुद को सीएम बनाने के लिये....
अपराधों के बढ़ने का मुख्य कारण बहुजन समाज पार्टी द्वारा अराजक तत्वों, अपराधियों व माफिया तत्वों को संरक्षण दिया जाना ही है। राज्य की पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी बहुजन समाज पार्टी की सरकार के मंत्रियों, विधायकों और नेताओं के दबाव-प्रभाव के कारण अपराध रोकने की मनचाही कार्रवाई करने में स्वयं को कमजोर पा रहे हैं।

सभी जिलों के पुलिस अधीक्षक दबाव और तनाव में हैं। माफिया और अपराधी तत्व बसपा द्वारा संरक्षित हैं। पुलिस उन पर हाथ नहीं डाल पाती। बढ़ते अपराधों की मुख्य अभियुक्त बसपा सरकार ही है।
लूट और डकैती की घटनाएं बेतहाशा बढ़ी हैं। हत्या की घटनाओं में भी वृद्धि हुई है। चालू वर्ष में नवम्बर माह तक बलात्कार की 1295 घटनाएं पंजीकृत हुई हैं लेकिन वास्तविक घटनाएं बहुत ज्यादा हैं।

लूट और डकैती की घटनाएं भी लिखी नहीं जाती। बहुजन समाज पार्टी से जुड़े माफिया तत्वों के विरूद्ध निरोधात्मक कार्रवाई नहीं होती। बुलंदशहर में बसपा के विधायक ने योजना बनाकर एक लड़की से छेड़खानी करने का विरोध करने वाले परिवारों पर हमला किया था। घंटो फायरिंग हुई थी। पुलिस अधीक्षक मौके पर थे। लेकिन लाचार रहे। इसी तरह की घटनांए पूरे प्रदेश में हो रही हैं। बसपा से जुड़े अराजक तत्वों को अपराध का लाइसेंस मिला हुआ है। पुलिस असहाय है। बसपा सरकार ने पुलिस को पार्टी का एजेंट बनाकर रख दिया है। पुलिस निष्पक्ष काम नहीं कर पाती।

पुलिस को निष्पक्ष रूप से काम करने का अवसर मिले तो यही पुलिस और यही अधिकारी आपराधिक गतिविधियों को रोक सकते हैं। लेकिन राज्य पुलिस के प्रमुख अपने अधीनस्थों को हटा नहीं सकते। पुलिस अधीक्षक बसपा नेताओं द्वारा दी गई सूची के अनुसार थानाध्यक्षों की पोस्टिंग करने को विवश हैं। थानाध्यक्षों पर पुलिस अधीक्षक का नियंत्रण नहीं है। बसपा ही थाने चला रही है। राज्य की पुलिस एक कमजोर लाचार और पार्टी निर्देशित एजेंसी बनकर रह गई है।ऐसे सारे तथ्य लेकर आम जनता जनजागरण और विरोध करेगी।

Monday 7 December 2009

मुद्दे, राजनीति के सुहाग हैं. बिन मुद्दे राजनीति उजड़ी, सूनी और अर्थहीन है. प्रसंग था, अर्थनीति, महंगाई और देश के गरीब. लोकसभा में डॉ राममनोहर लोहिया ने पहले ही भाषण में कहा, इस देश के एक नागरिक की आमद साढ़े तीन आने रोजाना है. इसके पहले वह संसद के बाहर कह चुके थे. प्रधानमंत्री पर रोज पच्चीस हजार खर्च होते हैं. यह बहस ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया. राजनीति में भ्रष्टाचार पर संसद में पहली आवाज फ़ीरोज गांधी ने उठायी. मशहर कानूनविद एजी नूरानी की चर्चित पुस्तक आयी थी. शायद नेहरूजी के कार्यकाल के अंतिम दौर में. नाम था मिनिस्टर्स मिसकंडक्ट. इससे समाजवादी सुरेंद्रनाथ द्विवेदी ने सवाल उठाया. मामला कुल साढ़े बारह हजार का था. केशवदेव मालवीय जैसे तपे नेता को मंत्री पद छोड़ना पड़ा. आज मुद्दे क्यों राजनीति से गायब हैं? क्या ऐसे सवाल नहीं रहे. महंगाई पर लोकसभा में बहस हई. तीन-चार दिन पहले. बमुश्किल चालीस सांसद थे. न पक्ष का कोई कद्दावर नेता, न विपक्ष का. शरद पवार ने हास्यास्पद बातें कीं. कहा, महंगाई बढ़ सकती है. राज्य नियंत्रण रखें. वगैरह-वगैरह. इसके पहले पवार, चार नवंबर को कह चुके हैं, अगली फ़सल आने तक महंगाई से राहत नहीं. कुछेक महीनों तक चीनी के दाम नहीं घटेंगे. आनेवाले महीनों में प्याज की कमी बनी रहेगी. कृषि मंत्री ने यह भी फ़रमाया, चावल के घरेलू उत्पादन में कमी होगी. उसी दिन योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंह अहलूवालिया ने कहा, खाद्यान्न कीमतें काबू में करना बहत कठिन. पर इन सवालों पर कोई सार्थक बहस नहीं. कौन पूछे इन लोगों से कि महंगाई क्यों नहीं रुक सकती? 19 नवंबर को फ़ोर्ब्स पत्रिका ने भारत के संपत्तिवानों की सूची जारी की. वर्ष 2009 में देश के सौ अमीरों के पास देश की 25 फ़ीसदी संपत्ति है. पूरी मीडिया में यह खबर सुर्खियों में छपी. देश के 100 धनी लोगों के पास करीब 27600 करोड़ डॉलर की संपत्ति. यह राशि देश के कुल जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की 25 फ़ीसदी है. रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अमीर धनवानों की संख्या, पिछले वर्ष 27 थी, अब 52 हो गयी है.

अर्थ अर्जन बहत अच्छी चीज है. बिना अर्थ, आज के माहौल में देश आगे नहीं बढ़ेगा. इसलिए साफ़ समझिए संपत्ति सृजन सबके हित में है. पर सवाल संपत्ति बढ़ने से नहीं है. मूल प्रश्न है कि किसी देश और समाज के 52 लोगों के हाथ में देश की जीडीपी का 25 फ़ीसदी हिस्सा कैसे रहेगा? क्यों रहेगा? क्यों भारत के अमीर ऐसे आलीशान घर बनायेंगे, जो दुनिया में किसी के पास नहीं हैं? धनियों और दौलतवानों के स्वर्ग अमेरिका में भी नहीं हैं. पत्नियों को चार-चार सौ करोड़ के बोइंग विमान जन्मदिन का तोहफ़ा देंगे? दूसरी ओर महंगाई की मार से त्रस्त आदमी चीनी, दाल, तेल, चावल के लिए भी तरसेगा. वह कौन सी अर्थनीति लोकसभा तय कर रही है, जिसमें अर्थव्यवस्था के अंतरविरोध नहीं उठ रहे हैं? बहस में वह धार क्यों नहीं आ रही कि इस देश की अर्थनीति में क्या सुधार चाहिए? क्यों विकास के लाभ रिस कर नीचे तक नहीं पहंच रहे? देश के दो बड़े उद्योगपति भाइयों के झगड़े लोकसभा में छाये रहते हैं. अपने प्रिय बिजनेस पेपर में पढ़ा. 28 नवंबर को. जूते का विज्ञान. देश में सबसे महंगे चार जूते कै से हैं? उनकी टेक्नोलॉजी क्या है? उनकी कीमत कैसे 11000 से लेकर 6000-6500 तक हैं? क्या यह देश ‘सुपररिच’ (अत्यंत धनाढ्य) का देश बन गया है?

26/11 पर लोकसभा में झड़प हई. प्रणब मुखर्जी और लालकृष्ण आडवाणी के बीच. मुद्दा था, कितने लोगों को मुआवजा मिला. क्या इस प्रसंग में इससे बड़ा सवाल नहीं था? सवाल तो यह उठना चाहिए कि 26/11 से इस मुल्क ने क्या सीखा? क्या हमारा ‘क्राइसिस मैनेजमेंट’ सुधरा? याद करिए, एनडीए का राज. जब प्लेन हाइजैक कर अफ़गानिस्तान के कंधार ले जाया गया. कई घंटे तक देश की टॉप क्राइसिस टीम नहीं बैठ सकी, क्योंकि उनमें को-ओर्डनेशन नहीं था. इसी तरह 26/11 में दिल्ली से एनएसजी के जवानों को मुंबई पहंचने में 12 घंटे से अधिक लग गये? क्या इस देश ने कभी उन लोगों के परिवार से पूछा, जो इसमें मार डाले गये? रांची के एक होनहार युवा मलेश बनर्जी मुंबई में आतंकवादियों द्वारा मारे गये. उनके पिता प्रो मानेंदु बनर्जी ने सिर्फ एक पंक्ति कहा- ‘द चैप्टर इज क्लोज्ड’. इस दर्द को कौन समङोगा. घटना के एक साल बाद उनकी यह प्रतिक्रिया पढ़ कर मन बेचैन रहा. कौन समङोगा यह पीड़ा? मुंबई की पुलिस प्रोफ़ेशनल मानी जाती है. पर इन दिनों वहां आपस में एक-दूसरे के खिलाफ़ पुलिस के बड़े अफसर बयान दे रहे हैं. मानो पुलिस पुलिस बल नहीं होकर राजनीतिक दल हो गये हैं. क्या यही शासन-प्रशासन है? क्या इसी तरह देश चलेगा? आतंकवादी हमलों के बरक्स पुलिस आधुनिकीकरण के बारे में देश के तीन विशेषज्ञों ने 25 नवंबर को ही अपनी राय व्यक्त की है. किरण बेदी ने, प्रो ब्रह्मचेल्लानी और प्रो एस चंद्रशेखरन ने. तीनों विशेषज्ञ हैं. तीनों की दृष्टि में इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं नहीं हआ. क्यों लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभाओं में सिस्टम से जुड़े सवाल उठ ही नहीं रहे? कहां भटक गयी राजनीति? और तो और, देश का मानस किधर जा रहा है? मुंबई की 26/11 की घटना को कई जगह ‘मार्केटिंग टूल’ (बाजारू स्मृति) के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश भी हई. क्या बाजार से जीवन के मूलभूत सवाल और सत्व भी नहीं बचेंगे?

लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट आयी. आनन-फ़ानन में. उस पर कोई गंभीर बहस नहीं. लगभग दो दशक एक रिपोर्ट देने में ! अतीत में भी अनेक आयोग बने. पर उन रिपोटाब का क्या हआ? क्या देश इसी रास्ते चलेगा? ये सवाल कहां उठेंगे? किस गली-मुहल्ले-चौराहे पर? देश नाजुक मोड़ पर खड़ा है. पर इसे समझने और जानने की कोशिश कहां हो रही है?

SOURCE:PRABHAT KHABAR

Sunday 6 December 2009

गरीबों को लूटने का सरकारी तंत्र

जरा सोचिए, अगर अत्यंत गरीब महिला बकरी खरीदना चाहती है तो उसे लघु वित्त संस्थान से ऋण मिल जाएगा. वह बकरी खरीदती है, जो उसके लिए जीविकोपार्जन का जरिया बनती है और इस प्रकार उसे सुरक्षा प्रदान कर उसकी जीवनरेखा बन जाती है. इसके बदले उसे 24 प्रतिशत की भारी ब्याज दर का ऋण चुकाना पड़ता है. दूसरी तरफ शहर में अगर आप एक कार खरीदना चाहते हैं तो किसी भी बैंक में चले जाइए, आपको 8 प्रतिशत ब्याज दर पर आसानी से ऋण मिल जाएगा. किश्तों पर टीवी या फ्रिज आदि खरीदना तो और भी सस्ता है. यह अकसर बिना किसी ब्याज के मिल जाता है. शहर में बैंक ऋण विशुद्ध रूप से व्यावसायिक व्यवहार है, जबकि गांव में इसे गरीबों के सशक्तीकरण के नाम पर दिया जा रहा है.

निश्चित तौर पर अगर गरीब महिला को न्यूनतम दर यानी 4 फीसदी पर बकरी खरीदने के लिए ऋण मिल जाता तो वह साल के अंत तक नैनो कार में बैठी हुई नजर आती. चूंकि ऐसा नहीं होने दिया जा रहा है, इसलिए मैं कभी-कभी हैरान रह जाता हूं कि लघु वित्तीय सहायता का उद्देश्य गरीबों को गरीबी के चंगुल से निकालना है या फिर बैंकों का स्वास्थ्य सुधारना. अगर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले गरीबों के सशक्तीकरण के लिए 24 प्रतिशत की भारी ब्याज दर पर वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है तो शहरों में रहने वाले अधिक साधन संपन्न लोग खुद के सशक्तीकरण के लिए इतनी ही ब्याज दर पर ऋण क्यों नहीं ले सकते? अगर गांवों में रहने वाले गरीब इस ब्याज दर पर अपना धंधा चला सकते हैं तो शहरों में रहने वाले ऐसा क्यों नहीं कर सकते. गरीबों को छोटे ऋणों के लिए तीन गुना ब्याज क्यों देना पड़ रहा है?





हमें नहीं भूलना चाहिए कि गांवों में रहने वाले 15 करोड़ अत्यंत गरीब लोग, जो लघु वित्तीय संस्थानों से ऋण लेते हैं, संभवत: नरेगा योजना के तहत काम करते हैं, जिसमें उन्हें मात्र 60 से 80 रुपये प्रतिदिन मिलता है और वह भी साल भर में सौ दिन के लिए. इस परिप्रेक्ष्य में क्या 24 प्रतिशत ब्याज दर वसूलना आपराधिक कृत्य नहीं है?

इसलिए यह बिल्कुल स्पष्ट है कि गरीबी एक बड़ा और संगठित व्यवसाय बन गई है. अगर आप पढ़े-लिखे हैं और एक लाभदायक व्यावसायिक उद्योग की तलाश में हैं और अगर आप अनिवासी भारतीय हैं तो और भी अच्छा. फिर तो लघु वित्त अवसर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं. इससे बेहतर कोई और विकल्प हो ही नहीं सकता. लघु वित्त संस्थान में सुनिश्चित लाभ है और वह भी सौ फीसदी वसूली के साथ.

आर्थिक असुरक्षा के दौर में लघु वित्त सुनिश्चित लाभ का व्यवसाय है. इसमें कोई हैरानी नहीं है कि मोंसेंटो, सिटीकार्प, एबीएन एमरो, आईसीआईसीआई, नाबार्ड, संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय संस्थानों के परिचारक मोटे तौर पर 12-13 प्रतिशत ब्याज दर पर लघु वित्त संस्थानों को ऋण दे रहे हैं. ये लघु वित्त संस्थान, जिनमें गैर सरकारी संगठन और अन्य अलाभकारी इकाइयां भी शामिल हैं, 24 प्रतिशत की मोटी ब्याज दर वसूल कर रहे हैं. लघु वित्त व्यवसाय चौतरफा फल-फूल रहा है.

इंडिया माइक्रोफाइनेंस रिपोर्ट 2009 हमें बताती है कि लघु वित्त व्यवसाय 97 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और इस सेवा का लाभ उठाने वालों की संख्या में 60 फीसदी वृद्धि हुई है. एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, एसकेएस माइक्रो फाइनेंस उड़ीसा, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में करीब 24 प्रतिशत ब्याज वसूल रहा है, इक्विटास माइक्रो फाइनेंस 21 से 28 प्रतिशत ब्याज हासिल कर रहा है और बेसिक्स माइक्रोफाइनेंस लघु ऋण 18 से 24 प्रतिशत ब्याज दर पर दे रहा है. लघु वित्त के क्षेत्र में अभूतपूर्व संवृद्धि हमें बताती है कि खेल के नियम बदलने पर भी गांवों के गरीबों का शोषण पूर्ववत जारी है.

लघु वित्त संस्थानों ने ऋण कथा के खलनायकों-साहूकारों का धंधा एक नए संगठित महाजन तंत्र के हाथों में सौंप दिया है. ये कोई साधारण साहूकार नहीं हैं, बल्कि सुशिक्षित व्यावसायिक वर्ग है, जो मार्केटिंग के तमाम हथकंडों से लैस है. इतना भारी ब्याज वसूल करके लघु वित्त संस्थान वस्तुत: गरीबों की कमर तोड़ देते हैं.

भारतीय रिजर्व बैंक के महज मूकदर्शक बने रहने पर हैरत होती है. प्रकट रूप में आरबीआई को केवल बैंकों के स्वास्थ्य की चिंता है, क्योंकि उपभोक्ता का आधार बनाए बिना ही वे 12 प्रतिशत की सुनिश्चित आय हासिल कर लेते हैं. मुझे इसमें कोई कारण नजर नहीं आता कि आरबीआई बैंकों को अधिकतम दो प्रतिशत ब्याज वसूलने को बाध्य न कर सके और लघु वित्त संस्थानों को गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों से अधिकतम अतिरिक्त दो प्रतिशत ब्याज लेने की अनुमति दे. कोई भी लघु वित्त संस्थान यदि गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों से 4 प्रतिशत से अधिक ब्याज दर वसूल करता है तो इसे अपराध माना जाए.
गरीबों का खून चूसने वाले इन लघु वित्त संस्थानों को अब अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. इसके लिए भारी बदलाव करने पड़ेंगे, किंतु सरकार को गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को उचित ब्याज दर पर ऋण मुहैया कराने के उपाय करने चाहिए. इस व्यवस्था में सुधार लाए जाने पर मैं यह पक्के तौर पर कह सकता हूं कि ऋण लेने के कुछ सालों में ही गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले भी कार चलाते देखे जा सकेंगे.
जब तक हिन्दुस्तान के नौजवान हिन्दुस्तान के किसान के पास नहीं जाएंगे, गांव नहीं जाएंगे. उनके साथ पसीना बहाकर काम नहीं करेंगे तब तक हिन्दुस्तान की आजादी का कोई मुकम्मिल अर्थ नहीं होगा. मैं हताश तो नहीं हूं लेकिन निराश लोगों में से हूं.

मैं मानता हूं कि हिन्दुस्तान को पूरी आजादी नहीं मिली है. जब तक ये अंगरेजों के बनाए काले कानून हमारे सर पर हैं, संविधान की आड़ में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट से लेकर हमारे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री फतवे जारी करते हैं कि संविधान की रक्षा होनी है. किस संविधान की रक्षा होनी चाहिए? संविधान में अमेरिका, आस्ट्रेलिया, केनेडा, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, जापान और कई और देशों की अनुगूंजें शामिल हैं. इसमें याज्ञवल्क्य, मैत्रेयी, चार्वाक, कौटिल्य और मनु के अनुकूल विचारों के अंश नहीं हैं. गांधी नहीं हैं. भगतसिंह नहीं हैं. लोहिया नहीं हैं. इसमें केवल भारत नहीं है

हमारे देश में से तार्किकता, बहस, लोकतांत्रिक आजादी, जनप्रतिरोध, सरकारों के खिलाफ अराजक होकर खड़े हो जाने का अधिकार छिन रहा है. हमारे देश में मूर्ख राजा हैं. वे सत्ता पर लगातार बैठ रहे हैं. जिन्हें ठीक से हस्ताक्षर नहीं करना आता वो देश के राजनीतिक चेक पर दस्तखत कर रहे हैं. हमारे यहां एक आई एम सॉरी सर्विस आ गई है. आईएएस क़ी नौकरशाही. उसमें अब भ्रष्ट अधिकारी इतने ज्यादा हैं कि अच्छे अधिकारी ढूंढ़ना मुश्किल है. हमारे देश में निकम्मे साधुओं की जमात है. वे निकम्मे हैं लेकिन मलाई खाते हैं. इस देश के मेहनतकश मजदूर के लिए अगर कुछ रुपयों के बढ़ने की बात होती है, सब उनसे लड़ने बैठ जाते हैं. हमारे देश में असंगठित मजदूरों का बहुत बड़ा दायरा है. हम उनको संगठित करने की कोशिश नहीं करते. हमारे देश में पहले से ही सुरक्षित लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के कानून बने हुए हैं. लेकिन भारत की संसद ने आज तक नहीं सोचा कि भारत के किसानों के भी अधिकार होने चाहिए. भारतीय किसान अधिनियम जैसा कोई अधिनियम नहीं है. किसान की फसल का कितना पैसा उसको मिले वह कुछ भी तय नहीं है. एक किसान अगर सौ रुपये के बराबर का उत्पाद करता है तो बाजार में उपभोक्ता को वह वस्तु हजार रुपये में मिलती है. आठ सौ नौ सौ रुपये बिचवाली, बिकवाली और दलाली में खाए जाते हैं. उस पर भी सरकार का संरक्षण होता है और सरकार खुद दलाली भी करती है.
चारो और निराशा का अंधकार फैला है , सरकारे धीरे धीरे पंगु होती जा रही है, राजधानी में ही रोजाना जुर्म हो रहा है,हत्या , बलात्कार , डकैती रॉकेट की स्पीड से बढ़ रही है, और सरकारों के पास स्थिति नियंत्रण में है के अलावा कुछ भी कहने को नहीं रह गया है ऐसे में तो दिल में यही आता है की "हर शाख पे उल्लू बैठा है ....."

Sunday 29 November 2009

आठ प्रधानमंत्री देने वाला राज्य उत्तर प्रदेश आज नेतृत्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है। समस्याओं के भंवर में फंसा राज्य रसातल की ओर बढ़ता जा रहा है। अफसोस की बात है कि इन समस्याओं के हल के लिए राज्य और केंद्र द्वारा जो प्रयास किए जा रहे हैं वे समस्याओं को बढ़ाने वाले साबित हो रहे हैं, क्योंकि अधिकाश निर्णय राज्य की बुनियादी जरूरतों व समस्याओं की विविधता को समझे बिना लिए जा रहे हैं। वास्तव में उत्तर प्रदेश अपने आप में अनेक विविधताओं को समाए हुए है। पूर्वी, मध्य, ब्रज, पश्चिमी और बुंदेलखंड, सभी हिस्सों की अपनी जरूरतें व समस्याएं हैं। साफ तौर पर कोई एक हल पूरे राज्य का हल नहीं हो सकता। हर क्षेत्र की समस्याओं का हल उसकी जनसाख्यिकीय और भौगोलिक खासियतों को ध्यान में रखकर ही किया जा सकता है। इसके अलावा विकास संबंधी मानकों के आधार पर राज्य के विभिन्न हिस्सों में भारी असंतुलन व अंतर है, लेकिन अफसोस की बात है कि राज्य के भीतर पनपते इन अंतरों को पाटने का कभी भी सार्थक प्रयास नहीं किया गया। इसकी विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी की आबादी 8 करोड़ है और अकेले यूपी की आबादी लगभग 20 करोड़ है। दुनिया के सिर्फ पाच देशों की आबादी ही इससे अधिक है।

उत्तर प्रदेश सरकार सूबे की इस विविधता से पूरी तरह से अनजान है। कृषि और शिक्षा अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। शिक्षा की बदहाली को इस बात से समझा जा सकता है कि प्राथमिक शिक्षा के मामले में जहा राष्ट्रीय औसत 34 छात्रों पर एक शिक्षक का है वहीं उत्तर प्रदेश में यह औसत 51 है। कृषि की हालत तो और भी बदतर है। राज्य के राजस्व का 36.8 प्रतिशत हिस्सा कृषि से आता है और 66 प्रतिशत लोग रोजगार के लिए अभी भी कृषि पर निर्भर हैं, लेकिन किसान और कृषि उपेक्षा के सबसे अधिक शिकार हैं। यूपी देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है, लेकिन किसानों को गन्ने की उचित कीमत मयस्सर नहीं है। केंद्र सरकार के ताजा फैसलों से गन्ना उत्पादक किसानों के समक्ष अस्तित्व का संकट उपस्थित हो गया है। इससे एक बार फिर साफ हो गया है कि केंद्र गन्ना किसानों और चीनी उद्योग को जंजीरों में जकड़ कर रखना चाहता है। पूरे राज्य के किसान इन दिनों गन्ने की कीमत को लेकर आदोलनरत हैं, कहीं वे अपनी फसल जला रहे हैं तो कहीं आत्मदाह कर रहे हैं। गन्ने की कीमतों पर उत्तर प्रदेश और देश में चल रही राजनीति अंतर्मन को झकझोर देने वाली है। पिछले साल की तरह चालू साल में देश में चीनी का उत्पादन घट गया और यह 150 लाख टन पर आ गया, जिससे चीनी की कीमतें आसमान छूने लगी हैं और उपभोक्ता बेहाल हो रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सरकार गन्ना किसानों को बाजार शक्तियों से अलग रखते हुए उनकी तकदीर के सारे फैसले खुद करना चाहती है। इसका परिचायक केंद्र सरकार का अध्यादेश है। देश के अलग-अलग राज्यों के किसानों और उनकी उत्पादकता को समझे बगैर केंद्र ने गन्ना मूल्य तय करने के लिए एफआरपी व्यवस्था लागू करने की तुगलकी घोषणा कर डाली। केंद्र सरकार ने इस अध्यादेश को तब वापस लिया जब किसानों ने दिल्ली में डेरा डाल दिया।

बड़ा सवाल यह है कि क्या देश भर के लिए गन्ने का एक दाम तय किया जा सकता है? विषेषज्ञों की मानें तो यह संभव ही नहीं है, क्योंकि गन्ना उत्पादन के लिहाज से देश कई हिस्सों में बंटा है। गन्ना असल में ट्रापिकल जलवायु की फसल है, जिसके लिए दक्षिणी राज्य और महाराष्ट्र उपयुक्त हैं। दक्षिणी राज्यों में गन्ने की प्रति हेक्टेयर उपज 90 से 110 टन तक है, जबकि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा जैसे गैर ट्रापिकल जलवायु वाले राज्यों में इसकी उत्पादकता 43 से 60 टन प्रति हेक्टेयर तक ही है। साफ है कि उत्तरी राज्यों में प्रति हेक्टेयर लागत अधिक बैठती है। जब उत्तरी राज्यों में गन्ने की उत्पादकता दक्षिणी राज्यों के मुकाबले आधी है तो देश भर में एकसमान गन्ना मूल्य निर्धारित करने का कोई औचित्य ही नहीं दिखता है। इन्हीं वजहों से देश के अन्य राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी गन्ने का रकबा लगातार कम होता गया। यह विचित्र है कि किसानों के बढ़ते जख्म के बीच उत्तर प्रदेश सरकार भी हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है। राज्य सरकार का ध्यान मूर्तिया लगवाने और पार्क बनवाने पर है। किसानों की समस्याओं और गन्ने की कीमतों को लेकर उसके स्वर अभी भी मद्धिम हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में गन्ना आंदोलन के और अधिक आक्रामक होने से शायद ही कोई इनकार कर सकता

Saturday 28 November 2009

http://www.janadesh.in/innerpage.aspx?Story_ID=1499%20&Parent_ID=1&Title=दलितों%20को%20डीएपी%20नही
इसलिए वोट का महत्व समझिए। वोट के बटन में आपके पांच वर्षो का भविष्य छुपा है. भविष्य बनाना है, तो सावधान होकर, सोच-समझ कर बटन दबाइए.राज्य में हुए भ्रष्टाचार की गंध, देश-दुनिया में फ़ैल गयी है. आये दिन बंद, अराजकता और हिंसा के बीच जीवन. यह भला झारखंडियों से बेहतर कौन जानता है ? रंगदारी, अपराधियों का भय, ध्वस्त पुलिस प्रशासन, भ्रष्ट सरकारें, यह सब झारखंड ने भोगा है. भोगा हुआ दुख, कहे हुए बयान से गहरा होता है. नक्सलियों की चुनौती-खौफ़ अलग है. इस चुनौती के बीच अंधेरे में रोशनी दिखाने की भूमिका विधायिका की थी. पर विधायिका में क्या हुआ ? यह भी झारखंडवासी जानते हैं.द्रौपदी का चीरहरण हुआ. कु राज दरबार खामोश रह गया. मूकदर्शक. उसी क्षण महाभारत की नींव पड़ गयी. झारखंड के कोने-कोने में अराजकता, भ्रष्टाचार, अशासन फ़ैलता रहा. क्योंकि अच्छे लोग घरों में चुप बैठ गये. मतदान, छुट्टी का दिन या जश्न का दिन नहीं होता. यह लोकतंत्र का मूल मर्म है. हजारों-हजार वर्ष की कुरबानी के बाद वोट का यह अधिकार मिला है. इसलिए वोट दें, हालात बदलें. लोग वोट देने नहीं जाते. ड्राइंग रूम में बैठ कर अच्छे समाज का ख्वाब देखते हैं. दरअसल समाज के पतन के ऐसे लोग जिम्मेदार हैं. घरों से निकलिए. झुंड में निकलिए. एक-एक वोट डालिए. इससे ही झारखंड का भविष्य बेहतर होगा. आपका भी. शायद केनेडी ने कहा था- अच्छे लोग घरों में सिमटते हैं, इसलिए हालात बदतर होता है . झारखंड के लिए यह प्रासंगिक उक्ति है.
भीष्म से बड़ा उदार चरित्र, ढूंढ़े मुश्किल है। द्रोणाचार्य, अप्रतिम हैं. कर्ण, सूर्य प्रतिभा से दीप्त है. पर इनके मौन या मूक सहमति से विनाश की नींव पड़ी. इसलिए घरों से निकलिए. आपका विवेक या अंतरात्मा जो कहे, उस पर चलिए. चुनाव में बड़े पैमाने पर धन-बल के इस्तेमाल की खबरें हैं. धन-बल अगर चुनाव प्रभावित करेगा, तो लोकतंत्र कमजोर होगा. हिंसा न हो, यह सबका दायित्व है. बूथों पर आपसी झड़प न हो, यह जरूरी है. यह सवाल एक दिन, बनाम पांच वर्ष का है. वोट का एक दिन= पांच वर्ष का भविष्य. इसलिए जाति, धर्म, अपना-पराया, बाहरी-भीतरी के उन्माद से बच कर काम करें. क्योंकि आप-अपना भविष्य गढ़ने जा रहे हैं.

निजी भविष्य बनाने के क्रम में सौदेबाजी नहीं होती, आत्मा की आवाज होती है. भारतीय मनीषियों ने कहा भी है. आत्म द्वीपो भव.लोकतंत्र के इस महापर्व के अवसर पर हम खुद ही अपने लिए प्रकाश बनें. समाज में रोशनी फ़ैल जायेगी.मत जरूर दें.पटमदा गया था. झारखंड आंदोलन के एक पुराने कार्यकर्ता मिले. नाम था बुद्धेश्वर महतो. झारखंड की दुर्दशा की कहानी उन्होंने लोकोक्तियों में सुनायी -नीधनेआर धन होले दिने देखे तारा(निर्धन व्यक्ति को धन मिलता है, तो दिन में ही तारे दिखता है)झारखंड में सत्ता मिलते ही लोग दिन में ही तारे देखने लगे. इसके बाद जो हुआ, वह देश ने देखा. पर बुद्धेश्वर महतो ने एक और लोकोक्ति सुनायी-गोबर खाले गाछे बाटिले, जल्दी उलटिए जाये.(गोबर के गे में अगर पेड़ बढ़ गया, तो वह अपने आप गिर जाता है)श्री महतो ने कहा, रांची की राजनीतिक धरातल गोबर का गा हो गया है. वहां जो पेड़ बढ़ते हैं, वो खुद अपने बोझ से गिर जाते हैं. वहीं सुदूर देहात में एक गंवई युवा ने कहा, राजनीति क्या है ? मनी (धनबल). फ़िर बताया, धनबल आया तो बंदूक और आदमी मिल जाते हैं. इस तरह पॉलिटिक्स = मनी. मैन और गन (राजनीति = पैसा, लोग और बंदूक). अगर राजनीति का यह बदरंग चेहरा बदलना है, तो यह वोट से ही बदलेगा. यह मान कर चलिए. राजनीति ही चीजों को बदलेगी. अच्छी राजनीति होगी, तो अच्छा माहौल होगा. बुरी राजनीति होगी, तो बुरा माहौल. अगर अच्छी राजनीति चाहते हैं, तो घरों में मत बैठिए. वोट डालिए. युवा, बेहतर भविष्य और नौकरी चाहते हैं, तो उन्हें राजनीति में सक्रिय होना होगा. कम से कम मतदान के दिन तो जरूर.
झारखंड विशेष ...


आज नौ वषाब बाद जहां झारखंड खड़ा है, वहां दो ही रास्ते हैं. सुधरने का या तबाह होने का. संयोग से चुनाव होनेवाले हैं. जो सुधार चाहते हैं, उनके लिए चुनाव एक अवसर है. चुनाव द्वार से ही सुधरने की पगडंडी गुजरती है. यह चुनाव झारखंड के लिए निर्णायक है, क्योंकि इस चुनाव के गर्भ से ही उस राजनीतिक संतान के जन्म की प्रतीक्षा है, जो झारखंड की बेड़ियों को काटेगा. इसके लिए जो भी सरकार बने, उसे कठोर निर्णय लेने होंगे. कई मोरचों पर. विधानसभा को हल ढ़ंढ़ना होगा. उन चुनौतियों-सवालों का जो झारखंड की बेड़ी-जंजीर बन चुके हैं. लगभग खत्म गवर्नेंस, बेकाबू भ्रष्टाचार और सरकार की उपस्थिति न होना, वे सवाल हैं, जिन्हें दसवें वर्ष में नयी सरकार और विधानसभा को ढ़ंढ़ने होंगे. अन्य जिम्मेवार संस्थाओं को भी.

अगर अतीत का राग बजा, तो फ़िर वही दलबदल, रोज सरकारों का आना-जाना, फ़िर भ्रष्टाचार का अनियंत्रित हो जाना. फ़िर झारखंड को तबाह होने से बचा पाना नामुमकिन है. नक्सली तब सबसे प्रभावी होंगे. अराजकता होगी. अव्यवस्था होगी.

इसलिए इस बार 15 नवंबर भिन्न पृष्ठभूमि में आया है. स्थितियां - हालात भिन्न हैं. चुनौतियां विषम हैं. हर मोरचों पर. राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, ओर्थक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में.

यह हल ढ़ंढ़ेगा कौन? कोई अवतार नहीं, चमत्कारी पुरुष नहीं, बल्कि झारखंड की जनता और नेता ही इसका हल ढ़ंढ़ेंगे. यह हल लोकतांत्रिक रास्ते से ही संभव है. बैलेट बॉक्स की पेटी से. इसलिए हर नागरिक को पहल करनी होगी. अकर्म की पीड़ा- बेचैनी से मुक्ति पाने के लिए. मतदान में भाग लेकर. ड्राइंग रूम में बैठ कर चिंतित होने से समाज-इतिहास नहीं बनता. इसलिए मतदान, अच्छे पात्रों, विचारों, दलों का चयन, राजनीतिज्ञों से सवाल-जवाब, ऐसे सारे प्रयास ही झारखंड को तबाह होने से बचा सकते हैं. यह ‘मत चूको चौहान’ की स्थिति है.
साभार- हरिवंश जी....
दिग्गज वोट मांगते घूम रहे हैं। जिनके दर्शन दुर्लभ हैं, जो सुरक्षा प्राचीरों में घिरे हैं, या जिनके जीवन का महत्वपूर्ण भाग पांच सितारा सुविधाओं में कटता है, वे गली-गांव भटक रहे हैं. सड़क छान रहे हैं. यह भ्रम हम दूर कर लें कि उन्हें हम मतदाताओं की चिंता है. नहीं, वे अपने लिए, अपने दल के लिए कवायद कर रहे हैं. हर दल झोली फैला चुका है. निर्दल भी याचक हैं.पर इनकी झोली में क्या है? किसलिए ये सत्ता चाहते हैं? यह पूछिए. पग-पग पर पूछिए. क्योंकि पूछने का मौका पांच वर्ष में एक बार आता है. अपना मत देकर पांच वर्षो के लिए अपना भविष्य आप गिरवी रखते हैं, इसलिए सोच-समझ लीजिए, झांसे में मत आइए. न जाति के, न धर्म के, न क्षेत्र के, न समुदाय के. न भावना में बहिए. ठोक-पीट कर फैसला कीजिए, क्योंकि आप अपना भविष्य तय करने जा रहे हैं, इसलिए जनता भी अपना एजेंडा बनाए. जहां और जब भी मौका मिले, दलों से पूछिए, प्रत्याशियों से बार-बार पूछिए कि गरीबों के लिए आपके पास कौन सी समयबद्ध योजनाएं हैं? क्या भूख, विकास, विकेंद्रीकरण, भ्रष्टाचार, माइनिंग (खनन), सुशासन, नक्सलवाद, विस्थापन वगैरह को आप झारखंड के संदर्भ में अहम मुद्दा मानते हैं? अगर हां, तो आपके पास समाधान के क्या ब्लूप्रिंट हैं?
पूछिए, क्या झारखंड में आप पंचायत चुनाव करायेंगे? क्या नीचे तक सत्ता का विकेंद्रीकरण होगा? कैसे और कब होगा? ग्रामीण विकास योजनाएं, कैसे नीचे तक पहुंचेगी, बगैर भ्रष्टाचार के ? बिचौलिये रहेंगे या जायेंगे? जन वितरण प्रणाली कैसे ठीक होगी? इस राज्यपाल के आने के पहले, चीनी, केरोसिन वगैरह गांवों तक नहीं पहुंचते थे, फिर ऐसा न हो, इसके लिए क्या कदम उठेंगे? बिजली बोर्ड, लुट चुका है, वह राज्य में अंधेरा बांटने का केंद्र बना दिया गया। क्या आनेवाले दिनों में बिजली बोर्ड सुधरेगा? कब तक 85 वर्ष की उम्रवाले बार-बार बिजली बोर्ड के अध्यक्ष बनेंगे या उत्तराखंड से भ्रष्ट तत्वों को बुला कर उन्हें बिजली बोर्ड की कमान सौंपी जायेगी? ऐसे सारे सुलगते सवालों के क्या हल हैं, विधायक बननेवालों के पास? यह पूछिए.
सवाल अनंत हैं, क्योंकि ये सब इन्हीं राजनीतिक रहनुमाओें की देन हैं। पूछिए. युवाओं के लिए आपकी झोली में कुछ है? झारखंड लोकसेवा आयोग की परीक्षाएं पारदर्शी बनें, चयन विवादास्पद न हों, इसके लिए क्या रास्ते अपनाये जायेंगे? कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और स्कूलों के बारे में सरकार बनानेवालों के पास क्या ठोस प्रस्ताव हैं? केंद्र की मंजूरी मिलने के बाद नौ वर्ष हो गये, लॉ इंस्टीट्यूट नहीं बना. दो-ढाई वर्ष से आइआइटी, आइआइएम के प्रस्ताव मारे-मारे फिर रहे हैं. न अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज खुले, न प्रबंधन के बेहतर संस्थान, न मेडिकल कॉलेज. क्या ये सवाल हमारे होनेवाले शासकों की जेहन में हैं? क्या झारखंड के भूखों को कम दर पर अनाज देने के लिए कोई तैयार है? झारखंड में गरीबों की संख्या को लेकर विवाद है. एनसी सक्सेना की रिपोर्ट मानें, तो झारखंड के गांवों के 80 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं. पर झारखंड सरकार मानती है 29 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं. केंद्र सरकार कहती है सिर्फ 25 लाख लोग झारखंड में गरीबी रेखा के नीचे हैं. यह संख्या निर्धारण कैसे होगा? कौन करेगा? यह सवाल किसी दल के एजेंडा में है? क्योंकि गरीबों की संख्या के आधार से ही केंद्र से अनाज, केरोसिन, राहत वगैरह मिलती है. सरकार के 2004-05 के आंकड़ों (एनएसएस) के अनुसार, झारखंड के 60 फीसदी निर्धनतम लोगों के पास कार्ड नहीं हैं. गरीबों के लिए बना ‘सपोर्ट सिस्टम’ (राहत योजनाएं) ध्वस्त हैं. लाल कार्ड नहीं है. जनवितरण प्रणाली लगभग ठप है. देश के सबसे निर्धनतम नौ जिले झारखंड में हैं. क्या ये सवाल भी कहीं उठ रहे हैं? महज शब्दों तक नहीं. ठोस सुझावों के साथ.

झारखंड की खनिज संपदा ही इसके लिए अभिशाप है. खनिज मामलों में हुई सौदेबाजी ने झारखंड को पूरी दुनिया में चर्चित बना दिया है. झारखंड की खनिज संपदा लुट रही है. झामुमो के एक पूर्व मंत्री ने पिछले दिनों भाषण में कहा कि वे चीन गये थे. उन्हें देख कर खुशी हुई कि झारखंड के लौह अयस्क से चीन के स्टील कारखाने चल रहे हैं. उन्हें नहीं मालूम कि चीन स्मगल कर झारखंड से लौह अयस्क मंगा रहा है. अपना लौह अयस्क भंडार सुरक्षित रख रहा है. यह भारत सरकार की विफलता है. पर झारखंड में सरकार बनानेवालों को स्पष्ट होना चाहिए कि उनके खनिजों का इस्तेमाल कैसे होगा ? उनकी शर्तो पर, उनके हित में. या यहां के नेता खनिज से सौदेबाजी कर धन कमायेंगे और विदेश भेजेंगे? यह भी सही है कि यह खनिज संपदा हमेशा नहीं रहनेवाली. इसलिए इसके उपयोग की सार्थक नीति होनी चाहिए. यह स्पष्ट हो, पारदर्शी हो, इससे विस्थापन न हो, पर्यावरण न नष्ट हो. इन सवालों के उत्तर किसके पास हैं, यह लोगों से पूछना चाहिए. इसी तरह कोयला खनन, पत्थर काटने, स्पंज आयरन वगैरह के मुद्दे हैं. नरेगा के तहत लोगों को काम नहीं मिल रहा. कृषि क्षेत्र में झारखंड में बड़े काम होने हैं. सिंचाई में रत्ती भर वृद्धि नहीं हो रही है, पर भारी पूंजी खर्च हो रही है. यह सब कैसे हो रहा है? कौन कर रहा है? क्या ये सवाल उठेंगे? इसी तरह भ्रष्टाचार का मामला सबसे संगीन है. भ्रष्टाचार नियंत्रण के बगैर झारखंड में कुछ भी संभव नहीं. राज्य सत्ता कोलैप्स कर चुकी है. इन्हें ठीक करने का ब्लूप्रिंट किसके पास है? कौन अपराधमु माहौल दे सकता है? कैसे नक्सली समस्या से झारखंड मु हो सकता है? इन्हीं सवालों के जवाब से नया झारखंड बनेगा? मूल सवाल है कि झारखंड के ये सवाल इन चुनावों में उठ रहे हैं या नहीं? जनता सोचे, पहल करे और पूछे.

Monday 24 August 2009

I Believe
  • All the citizens of a state cannot be equally powerful, but they may equally be free.
  • The worst form of inequality is to make inequal things equal.
  • Men are equal; it is not birth but virtue that makes the difference.
  • The essence of our effort is to ensure that every child has an equal opportunity, not to become equal but to become different -to realize whatever unique potential of body ,mind and spirit he or she possess.
  • When the sun rises, it rises for everyone.
  • Equal rights for all, special privileges for none.
  • Equality is not in regarding different things similarly; equality is in regarding different things differently.

Anti-Semitization of Indian politics in the name of ‘Hindu philosophy’

Last week has been one of the turbulent times in the history of BJP, the main opposition party at the centre in Delhi, with the unceremonious expulsion of Mr.Jaswant Singh for writing a book on Jinnah. It’s indeed an important development for the Indian polity too, because this very incident might shape up the nature of our national and state politics played by BJP in coming times.
The question is not about the unjust expulsion of a senior leader who served the party for thirty years, someone who occupied highly important posts in the Vajpayee government, but it goes much beyond that in larger context is that at first, what this event suggests about the BJP’s future core of action in politics; and secondly, how much selective and myopic our political parties like BJP have become in examining history.
Since the defeat in the recent 2009 general elections, it is the time for the party to do introspection on the reasons why their core middle-class voters have deserted them. Though that was the issue on what they had to think after the debacle of 2004 elections, but at that time they lived in denial by saying that they lost elections not because of their ideology but because anti-incumbancy factor worked in favour of Congress. But this time, they seriously needed to think about the reason behind the defeat, which they end up finding going back to their old age slogan of hard-hindutwa under the influence of RSS, its mother organisation.
Singh’s expulsion from the party sends a clear signal of the party going back under the clutches of RSS. We all know that had Mr.Singh been a member of the later, he would not have been ousted in such shocking manner. This is a bare fact that the BJP treats it members pretty nicely if the person has a profile of being sanghi. RSS was in fear that growing pressure from a few intellectual leaders within the party, BJP might shed off its old saffron cloth, and put on new liberal, moderate face to become a centre right party. This very sacking incident suggests that the RSS is tightening its grip on the party. But this is sad for the Indian polity because the more BJP slides towards its mother organization, the less it will become compatible towards fulfilling the aspirations of today’s India. Because India is not Iran or Israel, they’re fully misreading the mood of the people of this country.
If we take a look an introspective look on the brand of politics which RSS is asking BJP to play, then we find that primarily, Sanatan Hindu philosophy has never advocated the idea of division in society. It is based on accepting every other thought, assimilating them into one and moving on with inclusiveness and tolerance. That is the reason why many religions and movements originated, and flourished under the umbrella of Hinduism, because it has never tried to convert others nor has it ever felt or any threat from other ongoing religious school of thoughts.
Today the BJP is exactly trying to play the same politics of divisiveness in the name of Hinduism, which Jinnah played in 1940s. So are they any different from the later? So why is BJP making so much of noise about Jinnah’s politics if they are doing the same thing sixty years later in little softer way. Who has given them the right to anti-semitize the Indian politics in the name of Hindu Dharma? How can we call it a way of playing the politics of cultural nationalism?