Tuesday 30 March 2010

गुड़ खाएं और गुलगुले से परहेज

जहां संस्कार में अतिथि देवो भव शामिल हो, वहां कांग्रेस और कांग्रेसी सरकारें अमिताभ बच्च्न और उनके परिवार के साथ जिस तरह का क्षुद्र व्यवहार कर रही हैं वह शर्मिंदा करने वाला है। क्या कांग्रेसियों का धर्म – कर्म सिर्फ एक परिवार को खुश रखना भर रह गया है? येसा लगता है देश कांग्रेस का हो गया है और कांग्रेस निजी तौर पर सोनिया गांधी की। व्यक्तिगत पसंद – नापसंद सत्ता दल का सरकारी एजेंडा नहीं हो सकता। इमरजेंसी का दौर बहुतों को अभी याद होगा जब कांग्रेस के चंद चाटुकारों ने इंदिरा इज इंडिया का नारा देकर इंदिरा गांधी जैसी तेजवान, शक्तिशाली व दूरदर्शी नेता का बंटाधार करके रख दिया था। सोनिया को येसी चाटुकारिता से बचना चाहिए।

अमिताभ का कुसूर क्या है? मुंबई में नवनिर्मित सी-लिंक के उद्घाटन समारोह में वह खुद ब खुद नहीं गए, एनसीपी के बुलावे पर अतिथि बने थे। उस समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण भी पहुंचे। समारोह का बकायदा सरकारी निमंत्रण पत्र छपा और बंटा था। यह बात दीगर है कि अपनी सफाई में चव्हाण ने कहा कि उन्हें अगर पता होता कि अमिताभ आ रहे हैं वह समारोह में नहीं जाते। यह एक अलग मुद्दा हो सकता है कि जिस समारोह में मुख्यमंत्री जा रहे हों उसमे कौन मुख्य अतिथि है कैसे पता नहीं चला, वह भी तब जबकि आयोजन सहयोगी दल एनसीपी का था।

गठबंधन की सरकार क्या इसी तरह काम करती हैं? यह तो वही हुआ कि गुड़ खाएं और गुलगुले से परहेज । एनसीपी के साथ सत्ता की मलाई खाने में कांग्रेस को एतराज नहीं लेकिन उसके मान्य अतिथि (अमिताभ) मंजूर नहीं। तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद एनसीपी इसलिए प्रिय है क्योंकि उसके बिना कांग्रेस को महाराष्ट्र की सत्ता से दूर रहना पड़ेगा। मीठा-मीठा गप्प वाली ही बात है, वरना बात ज्यादा पुरानी नहीं, शरद पवार ने कांग्रेस क्यों छोड़ी या तोड़ी थी? सोनिया के विदेशी मूल के सवाल पर किसने विरोध का झंडा उठाया था? माना राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती, मौका और लाभ के प्रतिशत के अनुसार रिश्ते बनते व बिगड़ते हैं।

आज महंगाई के कारण पूरे देश में संप्रग सरकार की छीछालेदर हो रही है फिर भी पवार प्रेम सत्ता की अनिवार्य शर्त बना हुआ है। एनसीपी की देखिए, उसी ने अमिताभ को सी-लिंक के समारोह में निमंत्रित किया और विवाद होने पर एक सामान्य सा बयान (व्यर्थ का विवाद) देकर वह चुप बैठ गई। कम से कम उसे तो मुंबतोड़ जवाब देना था, हां हमने बुलाया था और हमारे अतिथि को अपमानित करने का कांग्रेस कोई हक नहीं रखती। अशोक चव्हाण तो कुरसी को लेकर इतने सहमे कि मराठी विद्वानों के पुणे वाले समारोह में एक दिन पहले ही हाजिरी लगाने पहुंच गए ताकि फिर बिग-बी के साथ मंच साझा करने का लांछन न सहना पड़े।


शीला दीक्षित को क्या हो गया? दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री हैं और यादाश्त इतनी कमजोर कि १० मार्च का समारोह भी भूल गईं जिसमें वह छोटे बच्चन अभिषेक के साथ मंच पर बैठी थीं। इसी समारोह में उन्होंने अभिषेक को अर्थ आवर का ब्रांड अंबेसडर घोषित किया था और शनिवार की रात जब इंडिया गेट पर अर्थ आवर मनाया गया तो अभिषेक को वहां आने से रोक दिया गया। वीडियो से उनके फुटेज हटवा दिए गए, अति उत्साह में या शीला दीक्षित को खुश करने के लिए आयोजकों ने वे पोस्टर तक फाड़ डाले जिनमें अभिषेक थे। राजनीतिक मतभेद और विरोध तो समझ में आता है लेकिन सरकार इसका क्या तर्क देगी?

पता नहीं १० मार्च के फोटो पर गांधी परिवार की नजर पड़ी थी या नहीं जिसमें दिल्ली की पर्यावरण प्रेमी मुख्यमंत्री प्रफुल्लित होकर अभिषेक के साथ मंच पर विराजमान थीं। अब वह इतना कहकर हाथ झाड़ लेती हैं कि समारोह के इंतजाम की जानकारी उन्हें नहीं। क्या बुढ़ापे में सचमुच यादाश्त कमजोर पड़ने लगती है?


राजनीति के रंग देखें, अमर सिंह एक समय कांग्रेस से अधिक सोनिया के आलोचक रहे। एटमी डील पर जब पहली संप्रग सरकार खतरे में पड़ी तो वही मुलायम को कांग्रेस के करीब लाने का सूत्रधार बने। अमर सिंह जो अमिताभ के सबसे नजदीकी राजनीतिक व पारिवारिक मित्र थे और संबंध बड़े-छोटे भाई का था, आज नई राजनीतिक जमीन की तलाश में सुबह-शाम सोनिया – राहुल चालीसा का पाठ कर रहे हैं और इस मुहिम में बच्चन परिवार कहीं पीछे छूट गया। *

क्या अमिताभ का पक्ष साधने पर कांग्रेस की राह उनके लिए कठिन हो सकती है? भाजपा ने जरूर पक्ष लिया है। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने भी समर्थन में आवाज उठाई है जिनका उत्तर भारतीयों पर हमले के मुद्दे पर अमिताभ से मतभेद हो गया था। यह जानते हुए भी कि कांग्रेस नहीं सुनेगी, भारतीय ओलंपिक संघ के उपाध्यक्ष वरिष्ठ विजय मल्होत्रा ने बिग-बी को राष्ट्रकुल खेलों का ब्रांड अंबेसडर बनाने की मांग कर डाली है।


महत्वपूर्ण यह कि कांग्रेसी सरकारों द्वारा बच्चन परिवार का अघोषित बहिष्कार के लगातार प्रयासों के बीच हाईकमान सोनिया गांधी चुप हैं। पारिवारिक मतभेद (अगर कोई हो) से ऊपर उठकर कम से कम उन्हें इतना जरूर कहना चाहिए जो हो रहा वह ठीक नहीं। आखिर यह वही परिवार है जिसे राजनीति में उतारने का पहला श्रेय स्व. राजीव गांधी को जाता है.

Saturday 20 March 2010

मायावती का मानसिक दिवालियापन

उत्तर प्रदेश में दलित भले ही भूखे मर रहा हो, लेकिन खुद को दलितों का मसीहा बताने वाली मायावती एक हजार रुपये के नोटों की माला पहन रही हैं। प्रदेश में दलितों को रहने के लिए ठीक ढंग से झोपड़े भी नसीब नहीं, लेकिन मायावती सरकार ने हजारों करोड़ रुपये बुतों पर पानी की तरह बहा दिए। माया का मनोविज्ञान उस वक्त और भी ज्यादा जटिल दिखाई देता है, जब वह गहनों से लदकर अपने जन्मदिन का केक काटती हैं। इतना ही नहीं, कुछ समय पहले तक तो उनके जन्मदिन पर खुलेआम वसूली भी की जाती थी।

मायावती का कहना है कि यह किस संविधान में लिखा है कि जीवित व्यक्ति की मूर्तिया नहीं लग सकतीं। मायावती जी, अपनी मूर्ति लगाना संवैधानिक तौर पर गलत नहीं है, लेकिन अगर बात नैतिकता या सामाजिक परंपराओं की हो तो इस पर सवाल उठना लाजिमी है। आप किसी पार्क या चौराहे पर जीते जी अपने बुत लगवा सकती हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आप लोगों को इस बात के लिए मजबूर कर सकती हैं कि वे इन बुतों के प्रति श्रद्धा-भाव रखें। दरअसल, किसी की भी मूर्ति या बुतों के प्रति आम लोगों के मन में कोई भावना तभी जन्म लेती है, जब उसने अपने कर्मो से जनमानस के सामने एक मिसाल पेश की हो।

अब आते है आंकड़ो पर, संयुक्त राष्ट्र की विश्व सामाजिक स्थिति 2010 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में दलितों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। प्रति हजार दलित बच्चों में 83 शिशु जन्म लेते ही मर जाते हैं और 119 बच्चों की मौत पाच वर्ष के भीतर ही हो जाती है। दलित आवश्यक वस्तुओं के उपभोग खर्च में सामान्य लोगों के उपभोग खर्च से 42 फीसदी पीछे हैं। उत्तर प्रदेश में हालात और भी ज्यादा बदतर हैं। दलित राजनीति के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले मायावती जैसे नेता दरअसल समाज के इस तबके को वोट बैंक की तरह ही इस्तेमाल करते हैं। उत्तर प्रदेश में दलित या गरीब तबके के उत्थान के लिए मायावती सरकार की तरफ से कोई बड़ी पहल नहीं की गई। दरअसल, एक डर यह भी है कि अगर दबे-कुचले लोग पूरी तरह जागरूक हो गए, तब माया की असली माया से वे भी पूरी तरह वाकिफ हो जाएंगे। उत्तर प्रदेश में दलित महिला का बलात्कार होता है तो अपराधी को पकड़ने के बजाय पीड़ित महिला को मुआवजा बाटा जाता है। प्रदेश में कई आंबेडकर गाव घोषित कर दिए गए हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते इन गावों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है।
राजधानी लखनऊ में बड़े-बड़े पार्को पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन आज भी उत्तर प्रदेश के कई गाव या कस्बों में पुरुष या महिलाओं को शौच के लिए बाहर ही जाना पड़ता है। समाज के दलित और कमजोर तबके को भी अब यह एहसास होने लगा है कि वोट बैंक के नाम पर दलित राजनीति का झडा उठाने वाले लोगों ने भी उनकी तरक्की या विकास के लिए कुछ नहीं किया।
काशीराम के जन्मदिन और बहुजन समाज पार्टी के 25 साल पूरे होने पर मायावती ने लखनऊ में महारैली का आयोजन कर डाला, जिसमें हर राजनीतिक पार्टी की रैलियों की तरह भीड़ जुटाने के लिए पूरे तंत्र को लगा दिया गया था। वातानुकूलित बसों और रेलगाड़ियों से लोगों को प्रदेश की राजधानी लखनऊ लेकर आया गया। अब एक बार बात फिर माया के मनोविज्ञान की। खिसकता जनाधार और काठ की हाडी बन चुके दलित वोट बैंक ने मायवती के मनोविज्ञान को झकझोर दिया है और अब लोगों की भीड़ जुटाकर वह खुद को तसल्ली देने की कोशिश में लगी हैं कि प्रदेश की जनता उनके साथ है। मायावती का यही मनोविज्ञान उनसे ऐसा कुछ कराता है, जो उनके इर्द-गिर्द मौजूद लोगों को भी सहज और स्वाभाविक नहीं लगता, लेकिन सबसे बड़ा डर यही कि बिल्ली के गले में घटी कौन बाधे और अगर ऐसा कुछ करने से ही सत्ता का सुख नसीब हो रहा हो तो फिर इस पर सवाल क्यों उठाए जाएं? आचार्य रजनीश की एक किताब में यह जिक्र था कि अगर बाजार में कोई शख्स अकड़कर चल रहा हो और वह आप से आकर टकरा जाए तो आप उस पर नाराज मत होना, क्योंकि वह शख्स समाज और परिवार में उपेक्षित है और वह लोगों का ध्यान खींचने के लिए इस तरह की हरकतें कर रहा है। ऐसा व्यक्ति गुस्से का नहीं, दया का पात्र है। समाज-सुधार और दलित उत्थान की बात करने वाले ऐसे नेताओं की कमी नहीं, जो लोगों का ध्यान खींचने के लिए कुछ ऐसा ही करते नजर आते हैं।

Wednesday 17 March 2010





कौन सा ऐसा इंसान होगा जिसकी आँखे में ये दृश्य देखकर पानी न उतर आये,सिवाय उसके जिसके आँखों का पानी सूख चूका हो या जो आज तक माँ बना इ का या फिर कुपोषण का दर्द न जानते हो, ये दृश्य है उस प्रदेश की बदहाली का जिस प्रदेश की महिला मुख्यमंत्री करोडो की माला पहनकर इठलाती है, जो भारत की सबसे ज्यादा कमानेवाली महिला बन चुकी है और जिसके चमचे और वफादार नस्ल की सरकारी मशीनरी दो दिन के अपने व्यक्तिगत, निजी आयोजन पर जनता के 250 करोड़ फूक डालते है,

ये दृश्य है उस प्रदेश का जहा की मुख्यमंत्री , सदियों से दबे कुचले , दलित और कुपोषित का नाम लेकर सत्ता में आयी और आज उन्ही का खून चूस कर उन्हे इस हालत पंहुचा दिया..ये दो दृश्य दिखाते है की आज क्या हालत कर दी है एक महिला की मुर्खता और उसके चाटुकारों की दौलत की हवस ने,

ये सिर्फ एक कुपोषित बच्चा नहीं है, बल्कि एक कुपोषित लोकतंत्र है, जो ऐसी जाहिल, निकम्मी और जोंक सरकार को सत्ता में बैठा देती है ; जो जवाब मांगने पर लाठिय और गोलिया चलवाती है, जिसके लिए मुर्तिया जिन्दा इंसानों से ज्यादा महत्वपूर्ण है और जो अपने निचे से फिसलती हुई सत्ता को देख रही है

मायावती की बहुप्रचारित राष्ट्रीय रैली पूरी तरह से फ्लाप हो गयी है. मायावती के समर्थकों ने दावा किया था कि रैली में 20 से 25 लाख लोग आ सकते हैं लेकिन रैली में पांच से छह लाख लोग ही आ सके. इसमें भी उत्तर प्रदेश से ज्यादा लोग महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से आये. खबर है कि मायावती ने इस असफलता का संज्ञान लेते हुए समीक्षा करने का फैसला किया है रैली के आयोजन पर ही 200 से 250 करोड़ रूपये खर्च किये गये. रमाबाई अंबेडकर पार्क में आयोजन स्थल पर किये गये खर्च के अलावा परिवहन और प्रचार पर भी जमकर खर्च किया गया. मायावती प्रशासन द्वारा रैली को सफल बनाने के लिए पूरे प्रदेश को पंगु बना दिया गया था. सारे रास्ते रमाबाई अंबेडकर पार्क की ओर ही मोड़ दिये गये थे लेकिन आनेवालों की उदासी ने मायावती को मायूस कर दिया होगा.

"मनी, मीडिया और माफिया से सावधान" कहे वाली मायावती से ये पूंछो की गले में पड़ा १००० के नोटों का हार क्या मणि नहीं है और पार्टी में कितने माफिया हैं | सूप बोले सूप बोले चलनी क्या बोले जिसमे ७२ छेद.


ये रैली का फ्लॉप होना सिर्फ रैली का फ्लॉप होना नहीं है, ये फ्लॉप होना है मायामुर्ती की महत्वाकान्छाओं के, उनके प्रधानमंत्री बना इ के सपने का, उसकी जनता की खून छोस कर रैली और जन्मदिन मानाने वाली नीतियों का.

ये फ्लॉप होना है उस सरकारी बेशर्मी, उस सरकारी गुंडा गर्दी का की केंद्र के पैसे से बनाये गए पूल का उद्घाटन एक गुंडा मंत्री कर देता है, जो अलीगढ में लड़ते मरते , हिन्दू मुस्लिमो को समझाने उनकी समस्या को दूर करने के बजाय अपने रैली में सरकारी मचिनारी को घुलाम बनाए का .. ये फ्लॉप होना है उस मानसिकता का जो वोटर्स को अपना मानसिक गुलाम समझ लेती है.

ये फ्लॉप होना है लोकतंत्र की हत्यारी सरकार का, ये फ्लॉप होना है नकली सोशल इंजिनीअरिंग का, और सबसे बड़ी और अच्छी बात ,ये फ्लॉप होना है उत्तर प्रदेश के दुर्भाग्य का.

Tuesday 2 March 2010

तांडव हाथी और 'हाथी' की सवारी कर रहे नेताओं का

आखिरकार उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार ने मेरठ में हाथी के तांडव पर तुरंत कार्रवाई करते हुए निर्णय कर लिया कि अब भीड़-भाड़ वाली जगहों पर हाथी को ले जाना कानूनन जुर्म होगा. मायावती प्रशासन का यह फैसला मेरठ की उस घटना के बाद आया है जिसमें एक शादी के दौरान हाथी ने जमकर उत्पात मचाया था. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मतवाला हाथी जिन दो लोगों को िरश्ते में बांधने की बघाई देने आया था वे दोनों भी सत्ता के हाथी पर सवार हैं? उनके मद को कौन चूर करेगा?

'हाथी' की सवारी कर रहे दो नेताओं ने राजनीति के साथ ही आपस में रिश्तेदार बनने का फैसला लिया। 24 फरवरी को बसपा के सांसद कादिर राणा के बेटे और वरिष्ठ बसपा नेता मुनकाद अली की बेटी की शादी की रस्म मेरठ के एक बड़े रिसोर्ट में पूरी की जा रही थीं। हालांकि इस्लाम में शादी की रस्म इतनी छोटी होती है कि उसे पांच आदमियों के बीच मात्र आधा घंटे में ही निपटाया जा सकता है। लेकिन दोनों नेतओं ने इतना आडम्बर किया कि मेरठ में दो दिन तक अफरा-तफरी का माहौल रहा। शादी में इतने लोगों ने शिरकत की कि मेरठ-दिल्ली रोड पर यातायात रोक दिया गया। मीलों लम्बा जाम लगा। जाम में फंसे लोग त्राहि-त्राहि कर बैठे। लोगों ने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि आम आदमी की नुमाइन्दगी करने का दावा करने वाले नेता ही अपनी शान-ओ-शौकत दिखाने के लिए आम आदमी को परेशानी में डाल दें ?

क्या इन्हें यह नहीं पता कि जाम में फंसे लोगों को कितना कष्ट होता है ? बच्चे प्यास से बिलबिला जाते हैं। मरीज वक्त पर अपनी दवा नहीं ले सकता। शहर में आने के बाद दूर-दराज जाने वालों के लिए वाहन उपलब्ध नहीं हो पाता। किसी युवा का इंटरव्यू छूट जाता है। क्योंकि सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं के बच्चों की शादी थी इसलिए पूरा प्रशासन व्यवस्था में जुटा हुआ था। बात यहीं खत्म हो जाती तो भी गनीमत थी। मुनकाद अली ने शादी की रस्म को भी चापलूसी का जरिया बना दिया। क्योंकि मायावती लखनउ में जगह-जगह हाथियों की मूर्तियां स्थापित कर रहीं हैं, शायद इसी से प्रेरणा लेकर मुनकाद अली ने 11 जीते-जागते हाथियों को ही शादी स्थल पर खड़ा करके चापलूसी की एक महान मिसाल पेश कर दी।

बात यहीं खत्म हो जाती तो फिर भी ठीक था। एक हाथी सुबह से भूखा था। हाथी को शायद या तो यह बुरा लगा कि सब इंसान तो लजीज खानों का मजा ले रहे हैं, लेकिन मुझ बेजुबान जानवर को सुबह से भूखा रखा हुआ है। और शायद यह बुरा लगा कि एक गरीब मुल्क के अमीर नेता कैसे शाही शादियों पर बेशुमार दौलत खर्च करके गरीबों के नमक पर छिड़क रहे हैं। शायद यह बुरा लगा हो कि 'सरकार' भी इन्हीं नेताओं की जी-हजूरी में लगी हुई है। तभी तो जैसे ही एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की गाड़ी हूटर बजाती हुई शादी स्थल पर आयी, हाथी के सब्र का बांध टूट गया। हाथी ऐसा बिफरा की उसने उत्पात मचाना शुरु कर दिया। कई दर्जन आलीशान गाड़ियों को अपने पैरों तले कुचल डाला। सूंड से उठाकर गाड़ियों को सड़क पर पटक दिया। चारों ओर अफरा तफरी मच गयी।

यह हाथी शायद मानवतावादी था, इसलिए उसने इंसानों को नुकसान नहीं पहुंचाया। हाथी अगले दिन तक काबू में नहीं आया। दिल्ली और लखनऊ से हाथी को काबू में करने के लिए विशेषज्ञ बुलाए गए, तब कहीं जाकर हाथी के उत्पात को रोका जा सका।

हादसे के बाद जिस तरह की शर्मनाक बातें हुईं, उन्हें सुन और देखकर पक्का यकीन हुआ कि नेताओं का नैतिक पतन ही नहीं हुआ है, बल्कि वे मुंह तक 'कीचड़' में धंस चुके हैं। इस कीचड़ में कादिर राणा और मुनकाद अली जैसे नेता इतने लिथड़ चुके हैं कि उनका चेहरा ही पहचान में नहीं आता। दावा वे आम आदमी की सेवा का करते हैं लेकिन उनके चेहरों के पीछे सामंती चेहरा छिपा है।

मुनकाद अली ने फरमाया कि 'मैंने तो हाथी को पागल नहीं किया है, जो इसके लिए मैं जिम्म्ेदारी लूं।' यह ठीक है मुनकाद ने हाथी को पागल नहीं किया, लेकिन उनसे यह सवाल तो किया ही जा सकता है कि किस 'पागल' ने उनको हाथियों की नुमाईश लगाने की सलाह दी थी ? हाथियों को लाकर शादी की कौनसी रस्म अदा की जा रही थी ? अब क्योंकि मामला सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं का था, इसलिए मुनकाद अली को शासन-प्रशासन ने भी कुछ नहीं कहा।

और अब शुरुआत होती है शासन और प्रशासन के , इन दोनों महानुभाव नेताओं के और दलित और आम जनता के हित के नाम पर सत्ता माँ आयी माया सरकार के सबसे घृणित चेहरे की, जिस पर थूकने का दिल करता है..यहां हाथी के मालिक को ही पकड़कर जेल भेज दिया गया। थाने में जो एफआईआर लिखायी गयी है, उसमें इस बात का जिक्र नहीं है कि हाथी वहां क्यों आया था? किसने बुलाया था ? यहां भी गरीब मार ही पड़ी। यह उस सरकार की हरकतें हैं, जो अपने आप को 'दलित' की सरकार कहती है।

'दलित' सरकार के नेताओं ने सामंतों को भी पीछे छोड़ दिया है। सच तो यह है कि मेरठ में 24 और 25 फरवरी को जो कुछ हुआ, वह एक भूखे हाथी का तांडव नहीं, सत्ता के मद में चूर 'हाथी' का तांडव था। एक भूखे हाथी के तांडव से पूरा शासन-प्रशासन कांप गया था, लेकिन उस दिन को याद करिए, जब देश का 'भूखी जनता' रुपी हाथी तांडव मचाने निकलेगा। तब इन 'सामंती' नेताओं को उस 'हाथी' से कौन बचाएगा ?