Saturday 20 March 2010

मायावती का मानसिक दिवालियापन

उत्तर प्रदेश में दलित भले ही भूखे मर रहा हो, लेकिन खुद को दलितों का मसीहा बताने वाली मायावती एक हजार रुपये के नोटों की माला पहन रही हैं। प्रदेश में दलितों को रहने के लिए ठीक ढंग से झोपड़े भी नसीब नहीं, लेकिन मायावती सरकार ने हजारों करोड़ रुपये बुतों पर पानी की तरह बहा दिए। माया का मनोविज्ञान उस वक्त और भी ज्यादा जटिल दिखाई देता है, जब वह गहनों से लदकर अपने जन्मदिन का केक काटती हैं। इतना ही नहीं, कुछ समय पहले तक तो उनके जन्मदिन पर खुलेआम वसूली भी की जाती थी।

मायावती का कहना है कि यह किस संविधान में लिखा है कि जीवित व्यक्ति की मूर्तिया नहीं लग सकतीं। मायावती जी, अपनी मूर्ति लगाना संवैधानिक तौर पर गलत नहीं है, लेकिन अगर बात नैतिकता या सामाजिक परंपराओं की हो तो इस पर सवाल उठना लाजिमी है। आप किसी पार्क या चौराहे पर जीते जी अपने बुत लगवा सकती हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आप लोगों को इस बात के लिए मजबूर कर सकती हैं कि वे इन बुतों के प्रति श्रद्धा-भाव रखें। दरअसल, किसी की भी मूर्ति या बुतों के प्रति आम लोगों के मन में कोई भावना तभी जन्म लेती है, जब उसने अपने कर्मो से जनमानस के सामने एक मिसाल पेश की हो।

अब आते है आंकड़ो पर, संयुक्त राष्ट्र की विश्व सामाजिक स्थिति 2010 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में दलितों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। प्रति हजार दलित बच्चों में 83 शिशु जन्म लेते ही मर जाते हैं और 119 बच्चों की मौत पाच वर्ष के भीतर ही हो जाती है। दलित आवश्यक वस्तुओं के उपभोग खर्च में सामान्य लोगों के उपभोग खर्च से 42 फीसदी पीछे हैं। उत्तर प्रदेश में हालात और भी ज्यादा बदतर हैं। दलित राजनीति के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले मायावती जैसे नेता दरअसल समाज के इस तबके को वोट बैंक की तरह ही इस्तेमाल करते हैं। उत्तर प्रदेश में दलित या गरीब तबके के उत्थान के लिए मायावती सरकार की तरफ से कोई बड़ी पहल नहीं की गई। दरअसल, एक डर यह भी है कि अगर दबे-कुचले लोग पूरी तरह जागरूक हो गए, तब माया की असली माया से वे भी पूरी तरह वाकिफ हो जाएंगे। उत्तर प्रदेश में दलित महिला का बलात्कार होता है तो अपराधी को पकड़ने के बजाय पीड़ित महिला को मुआवजा बाटा जाता है। प्रदेश में कई आंबेडकर गाव घोषित कर दिए गए हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते इन गावों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है।
राजधानी लखनऊ में बड़े-बड़े पार्को पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन आज भी उत्तर प्रदेश के कई गाव या कस्बों में पुरुष या महिलाओं को शौच के लिए बाहर ही जाना पड़ता है। समाज के दलित और कमजोर तबके को भी अब यह एहसास होने लगा है कि वोट बैंक के नाम पर दलित राजनीति का झडा उठाने वाले लोगों ने भी उनकी तरक्की या विकास के लिए कुछ नहीं किया।
काशीराम के जन्मदिन और बहुजन समाज पार्टी के 25 साल पूरे होने पर मायावती ने लखनऊ में महारैली का आयोजन कर डाला, जिसमें हर राजनीतिक पार्टी की रैलियों की तरह भीड़ जुटाने के लिए पूरे तंत्र को लगा दिया गया था। वातानुकूलित बसों और रेलगाड़ियों से लोगों को प्रदेश की राजधानी लखनऊ लेकर आया गया। अब एक बार बात फिर माया के मनोविज्ञान की। खिसकता जनाधार और काठ की हाडी बन चुके दलित वोट बैंक ने मायवती के मनोविज्ञान को झकझोर दिया है और अब लोगों की भीड़ जुटाकर वह खुद को तसल्ली देने की कोशिश में लगी हैं कि प्रदेश की जनता उनके साथ है। मायावती का यही मनोविज्ञान उनसे ऐसा कुछ कराता है, जो उनके इर्द-गिर्द मौजूद लोगों को भी सहज और स्वाभाविक नहीं लगता, लेकिन सबसे बड़ा डर यही कि बिल्ली के गले में घटी कौन बाधे और अगर ऐसा कुछ करने से ही सत्ता का सुख नसीब हो रहा हो तो फिर इस पर सवाल क्यों उठाए जाएं? आचार्य रजनीश की एक किताब में यह जिक्र था कि अगर बाजार में कोई शख्स अकड़कर चल रहा हो और वह आप से आकर टकरा जाए तो आप उस पर नाराज मत होना, क्योंकि वह शख्स समाज और परिवार में उपेक्षित है और वह लोगों का ध्यान खींचने के लिए इस तरह की हरकतें कर रहा है। ऐसा व्यक्ति गुस्से का नहीं, दया का पात्र है। समाज-सुधार और दलित उत्थान की बात करने वाले ऐसे नेताओं की कमी नहीं, जो लोगों का ध्यान खींचने के लिए कुछ ऐसा ही करते नजर आते हैं।

1 comment:

  1. ऐसे लोग न तो दलित के मसीहा हो सकते है और न ही किसी और वर्ग के, इस प्रकार के प्रदर्शन निश्चित रूप से समाज के लिये अच्‍छा संदेश नही दे रहे है।

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