Tuesday 22 December 2009

संदर्भ : नये राज्य

बचपन में मुहावरा सुना, आग से खेलना. आशय था, ऐसे संकट-सवाल, जो आग की तरह हैं, जलाने, नष्ट करने की क्षमता से संपन्न. उन सवालों से व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और दुनिया बचे. फूंक-फूंक कर कदम उठाये. लोक अनुभव से निकले, इस मुहावरे में बरजने का भाव है. आगाह करने का, सावधान रखने का, ताकि कोई आग से मत खेले. नहीं तो जलना-भस्म होना नियति है.

देश में अनंत ज्वलंत मुद्दे हैं. संकट और चुनौतियां हैं. पर हमारी राजनीति आग से ही खेलना चाहती है. लेकिन आग लगाना आसान है, बुझाना कठिन. नेता गद्दी, कुर्सी और सत्ता के लिए देश को तबाह करने पर तुले हैं. तेलंगाना बनाने की घोषणा हुई. बगैर सोचे-समङो. और देश में एक कठिन मुद्दा खड़ा हो गया है. पैशन और इमोशन (आवेग और भावना) से जुड़ा. एक भूल ने देश में नया बवंडर खड़ा कर दिया है.10 नये राज्यों की मांग दो दिनों के अंदर हो गयी है. कूचबिहार, बोडोलैंड, पूर्वाचल, बुंदेलखंड, विदर्भ, रायलसीमा, मिथिलांचल, तुलुनाडु. ये आठ हैं. अवध, भोजपुर और न जाने कितने और राज्य चाहिए. मायावती ने उत्तर प्रदेश विभाजन की मांग कर दी है. जसवंत सिंह गोरखालैंड के प्रवक्ता बन गये हैं. ओड़िशा-छत्तीसगढ़ के पश्चिमी जिलों को मिला कर एक नये राज्य की मांग भी हुई है. कच्छ और राजस्थान के विभाजन की चर्चा भी हवा में है.

क्या कभी किसी ने सोचा, यह मुल्क जा कहां रहा है? भाषाई आंदोलन, बाल ठाकरे की मराठी अस्मिता, अब राज ठाकरे का मराठी मानुष, भिंडरावाले का आंदोलन, अयोध्या प्रकरण, सांप्रदायिक सवाल, जातिगत मुद्दे जैसे सवालों से इस देश में समय-समय पर जो आग लगी, उससे मुल्क ने क्या सीखा? क्या इन भावात्मक सवालों (आग) से कोई सबक मिला? कितना झुलसा है, यह देश, जिस देश कि चौहद्दी पर बार-बार चीन अपनी ताकत का एहसास कराये, आतंकवाद की चुनौती लगातार बनी हो, पचासों करोड़ नितांत गरीब, किसी तरह जी रहे हों, प्रधानमंत्री के शब्दों में, जहां आजादी के बाद की सबसे बड़ी चुनौती नक्सल समस्या मौजूद हो, वहां एक नया पेंडोरा बॉक्स (भानुमती का पिटारा) खोलने के कदम को आप क्या कहेंगे ?

12 दिसंबर की खबर है प्रतिबंधित उल्फ़ा के नेता परेश बरूआ ने फ़िर संप्रभुता की बात उठायी है. वे असम में जनमत संग्रह चाहते हैं. कश्मीर की आग, आज भी धधक रही है. वहां भी विदेशी ताकतें चाहती हैं, जनमत संग्रह हो. साठ के दशक में तमिलनाडु से ऐसी मांग उठी. उस आवाज से देश स्तब्ध था. राज्यों में भाषा, क्षेत्र, नस्ल, संस्कृति ओद की संकीर्ण निष्ठाएं गंभीर रूप ले सकती हैं. मधु लिमये ने चेताया था, आत्मनिर्णय के छद्म सिद्धांत का प्रचार करनेवाला सोवियत संघ टुकड़े-टुकड़े हो चुका है. पर क्यों इस मुल्क के राजनेता बार-बार आग में जलने को आतुर हैं ?

तर्क यह है कि छोटे राज्य बनें. विकेंद्रीकरण हो. ताकि सुचारु शासन चले. यह सैद्धांतिक पक्ष है. आज यथार्थ क्या है? छोटे राज्य हों या बड़े राज्य, चलानेवाले महत्वपूर्ण हैं. अंगरेजी में कहते हैं- संस्था गढ़नी है, तो सबसे पहले ‘मैन’ (आदमी) चाहिए.

आदमी से आशय काबिल लोग. सक्षम लोग. मूलत राजनीति में चरित्र चाहिए. चरित्र और सिद्धांत से रहित दलों की आजकल बाढ़ आ गयी है. किसी में कोई राष्ट्रीय सपना बचा नहीं है. न देश का. न समाज का. हां अपने उद्धार का सपना जरूर है,

इसलिए परिवारों के दल बनाये हैं. ऐसे ही दल अगर छोटे राज्यों का भविष्य तय करेंगे, तो यह देश कहां पहुंचेगा? .

जनता पार्टीने घोषणा पत्र में कहा था कि वह छोटे राज्यों की हिमायती है. सत्ता का विकेंद्रीकरण चाहती है.चंद्रशेखरजी ने एक प्रसंग कहा, मोरारजी और चरण सिंह इच्छुक थे, छोटे राज्य बनाने के लिए. पर हमने विरोध किया. तब मोरारजी प्रधानमंत्री थे. चरण सिंह गृह मंत्री. चंद्रशेखरजी ने कहा, न आप पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं, न चौधरी साहब, सरदार पटेल. न उस युग के तपे-तपाये नेता राज्यों में हैं. तब ’50 और ’60 के दशकों में भाषाई प्रांत बनाने में कितना खून-खराबा हआ ? विद्वेष फ़ैला ? इस आग को, जब पंडितजी-पटेल जैस लोग नियंत्रित नहीं कर सके, तो क्या आप लोग कर पायेंगे? पहले यह तय कर लीजिए, तब कदम उठाइए. जयप्रकाशजी भी तब छोटे राज्यों के पक्षधर थे. चंद्रशेखरजी का यह तर्क सबको जंचा. बात आगे नहीं बढ़ी.

अब स्थिति क्या हो गयी है? सत्ता में बैठने के लिए कोई भी समझौता? कोई भी मांग मान लेना? चंद्रशेखर राव के अनशन प्रसंग को गहराई से सोचा गया? कैसे गृह सचिव बयान देते हैं, और फ़िर वापस लेते हैं? क्या यही प्रक्रिया है? आंध्र में सड़कों पर अलग-अलग गुटों में जंग होने लगती है. वकीलों के बीच. नेताओं के बीच. और पूरा राज्य आंदोलित और अस्थिर हो जाता है. जब आंध्र बना, तब विशाल आंध्र की मांग हई थी. कहा गया कि मद्रास राज्य में तेलुगु भाषियों के साथ न्याय नहीं हो रहा है. पोट्टी श्रीरामुलु ने अनशन किया. मान लिया गया कि देश में शासन की इकाई भाषाई राज्य होंगे. और फ़िर आंध्र बना. अब वह आंध्र कितने हिस्सों में बंटेगा? एक ही समूह, जाति, भाषा, संस्कृति, पहचान के लोग हैं. अब क्या जाति पर, कुल या गोत्र पर और अंतत परिवार के आधार पर यह देश खंड-खंड होगा?

याद करिए, संयुक्त महाराष्ट्र की बात उठी. गुजरात अलग हआ. आइक्या केरल की चर्चा हई. मलयाली भाषी लोगों के लिए राज्य बना. गुजरात और हरियाणा अस्तित्व में आये. 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग ने इसी आधार पर राज्यों को स्वरूप दिया. झारखंड में पलामू के वरिष्ठ पत्रकार थे, रामेश्वरमजी. उन्होंने अभियान चलाया. झारखंड के उस इलाके को केंद्रशासित अंचल बनाने का. आज तक चंडीगढ़ की समस्या नहीं सुलझ सकी. पंजाब आंदोलन में यह एक बड़ा मुद्दा था. क्या कुछ नहीं देखा पंजाब और इस मुल्क ने? आतंकवाद, एक प्रधानमंत्री की हत्या, राजीव-लोंगोवाल करार, पंजाब और हरियाणा के बीच के विवाद. महाराष्ट्र - कर्नाटक का दशकों पुराना सीमा विवाद. इसके लिए बना महाजन आयोग की रिपोर्ट. पंजाब सीमा विवाद पर शाह कमीशन की रिपोर्ट. किस ऐसे संवेदनशील मुद्दा को हमारे नेता सुलझा सके हैं? अनगिनत विवादास्पद और विस्फोटक रपटें पड़ी हैं. पुराने घावों और नासूर को मत हरा करिए. मामूली मुद्दों पर भी साहस के साथ कदम उठाने की कूवत नहीं है आज की राजनीति में, पर आग लगाने में माहिर हैं. पहले क्षेत्रीय दलों के नेताओं के पास भी राष्ट्रीय दृष्टि थी. आज प्रादेशिक दृष्टिकोण है. संकीर्ण दृष्टिकोण है. परिवार ही पार्टी है. ऐसे लोग क्या इस देश में आग बुझा पायेंगे? मधु लिमये ने लिखा था, "भारत की राष्ट्रीय एकता प्रदीर्घ प्रयत्नों के बाद साकार हई है. मेरी इच्छा है कि कोई काम ऐसा न किया जाये कि जिससे यह एकता खतरे में आ जाये"

मैं विकेंद्रीकरण का समर्थक हं. लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हर मामले में केंद्र के पर काट कर उन्हें प्रांतिक स्वायत्तता के नाम पर राज्यों पर चिपकाना. अपने अधिकारों में जिला पंचायत, महानगरपालिका, नगरपालिका तथा ग्राम पंचायतों को साङोदारी देने के लिए राज्य सरकारें कहां तैयार हैं.’्

अखिल भारतीय दल की विरूदावली क्यों? फ़िर केंद्र की भी क्या जरूरत है? इंका, जनता, माक्र्सवादी कम्युनिस्ट ओद दलों को बरखास्त कर, अकाली, द्रमुक, तेलगुदेशम, अस-गण परिषद ओद विशुद्ध प्रादेशिक दलों को ही रहने देना उचित होगा! पर ऐसा होने से भारतीय गणराज्य की वही दुर्गति होगी, जो मराठा साम्राज्य की हई थी.’

तेलंगाना प्रकरण में एक नयी आवाज भी है. हैदराबाद को लेकर झगड़ा है. अगर बंटवारा हआ, तो यह शहर किसके पास रहेगा? भौगोलिक अधिकार तो तेलंगाना का है. पर इसे विकसित करने में पैसा लगाया है , अन्य तेलुगु भाषियों ने भी. चंडीगढ़ विवाद अब तक अनसुलझा है. 1946 में कलकत्ता को लेकर दंगे हए. इजरायली और फ़िलिस्तीनियों के बीच जेरूसलम को लेकर झगड़ा आज भी है. मुंबई पर राज ठाकरे हक जता रहे हैं. शहरों को लेकर यह झगड़ा क्यों होता है? इतिहास में संपन्न शहरों पर बाहरी हमलों की नजीर पहले भी है. चूंकि शहर, संपन्नता के प्रतीक हैं. वहां बड़ा कारोबार है, उद्योग-धंधा है. अवसर हैं. सपने हैं. इसलिए विवाद है. इस विवाद का हल है, पुरुषार्थ और कर्म.

"अगस्टस सीजर का एक बयान पढ़ा, मुङो रोम मिला, ईंट के शहर के रूप में, मैंने इसे जब छोड़ा, तो यह संगमरमर का शहर था. ईंट से संगमरमर की इस यात्रा के पीछे आशय उद्यम से है, परिश्रम से है, संकल्प से है, नया कुछ करने से है."

हम छोटे-छोटे विकेंद्रित सुंदर शहर नहीं बना सकते, जहां उद्योग-धंधों के अवसर हों, शहरी जीवन हों? अब तो भारत के स्तर पर नगर विकास के लिए बड़ी राशि मिल रही है, केंद्र से. पुरुषार्थ, कर्म और श्रम से नयी मुंबई और नये हैदराबाद बन सकते हैं. हर राज्य में. पर ऐसे सोच के लोग राजनीति में हैं कहां?

आज सुपरपावर चीन के मुकाबले भारत को खड़ा होना है, तो भारत को आग लगानेवाले नेता नहीं चाहिए. बल्कि स्टेट्समैन चाहिए. कितना संकट है, देश के सामने? ऊर्जा संकट, पर्यावरण संकट, घटता खाद्यान्न, कानून -व्यवस्था की आंतरिक चुनौतियां, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद वगैरह. प्रो आर्नल्ड टायनबी ने लिखा था, कोई भी सभ्यता अपनी चुनौतियों को हल करने का कितना सामथ्र्य रखती हैं, इसी आधार पर बढ़ती है. जब कोई सभ्यता अपनी चुनौतियों का हल न ढ़ंढ़ पाये, तो वह चूकने लगती है. क्या बाहरी चुनौतियां कम हैं कि घर के अंदर ही हमारे नेता आग लगाने लगे?

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