Sunday 6 December 2009

गरीबों को लूटने का सरकारी तंत्र

जरा सोचिए, अगर अत्यंत गरीब महिला बकरी खरीदना चाहती है तो उसे लघु वित्त संस्थान से ऋण मिल जाएगा. वह बकरी खरीदती है, जो उसके लिए जीविकोपार्जन का जरिया बनती है और इस प्रकार उसे सुरक्षा प्रदान कर उसकी जीवनरेखा बन जाती है. इसके बदले उसे 24 प्रतिशत की भारी ब्याज दर का ऋण चुकाना पड़ता है. दूसरी तरफ शहर में अगर आप एक कार खरीदना चाहते हैं तो किसी भी बैंक में चले जाइए, आपको 8 प्रतिशत ब्याज दर पर आसानी से ऋण मिल जाएगा. किश्तों पर टीवी या फ्रिज आदि खरीदना तो और भी सस्ता है. यह अकसर बिना किसी ब्याज के मिल जाता है. शहर में बैंक ऋण विशुद्ध रूप से व्यावसायिक व्यवहार है, जबकि गांव में इसे गरीबों के सशक्तीकरण के नाम पर दिया जा रहा है.

निश्चित तौर पर अगर गरीब महिला को न्यूनतम दर यानी 4 फीसदी पर बकरी खरीदने के लिए ऋण मिल जाता तो वह साल के अंत तक नैनो कार में बैठी हुई नजर आती. चूंकि ऐसा नहीं होने दिया जा रहा है, इसलिए मैं कभी-कभी हैरान रह जाता हूं कि लघु वित्तीय सहायता का उद्देश्य गरीबों को गरीबी के चंगुल से निकालना है या फिर बैंकों का स्वास्थ्य सुधारना. अगर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले गरीबों के सशक्तीकरण के लिए 24 प्रतिशत की भारी ब्याज दर पर वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है तो शहरों में रहने वाले अधिक साधन संपन्न लोग खुद के सशक्तीकरण के लिए इतनी ही ब्याज दर पर ऋण क्यों नहीं ले सकते? अगर गांवों में रहने वाले गरीब इस ब्याज दर पर अपना धंधा चला सकते हैं तो शहरों में रहने वाले ऐसा क्यों नहीं कर सकते. गरीबों को छोटे ऋणों के लिए तीन गुना ब्याज क्यों देना पड़ रहा है?





हमें नहीं भूलना चाहिए कि गांवों में रहने वाले 15 करोड़ अत्यंत गरीब लोग, जो लघु वित्तीय संस्थानों से ऋण लेते हैं, संभवत: नरेगा योजना के तहत काम करते हैं, जिसमें उन्हें मात्र 60 से 80 रुपये प्रतिदिन मिलता है और वह भी साल भर में सौ दिन के लिए. इस परिप्रेक्ष्य में क्या 24 प्रतिशत ब्याज दर वसूलना आपराधिक कृत्य नहीं है?

इसलिए यह बिल्कुल स्पष्ट है कि गरीबी एक बड़ा और संगठित व्यवसाय बन गई है. अगर आप पढ़े-लिखे हैं और एक लाभदायक व्यावसायिक उद्योग की तलाश में हैं और अगर आप अनिवासी भारतीय हैं तो और भी अच्छा. फिर तो लघु वित्त अवसर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं. इससे बेहतर कोई और विकल्प हो ही नहीं सकता. लघु वित्त संस्थान में सुनिश्चित लाभ है और वह भी सौ फीसदी वसूली के साथ.

आर्थिक असुरक्षा के दौर में लघु वित्त सुनिश्चित लाभ का व्यवसाय है. इसमें कोई हैरानी नहीं है कि मोंसेंटो, सिटीकार्प, एबीएन एमरो, आईसीआईसीआई, नाबार्ड, संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय संस्थानों के परिचारक मोटे तौर पर 12-13 प्रतिशत ब्याज दर पर लघु वित्त संस्थानों को ऋण दे रहे हैं. ये लघु वित्त संस्थान, जिनमें गैर सरकारी संगठन और अन्य अलाभकारी इकाइयां भी शामिल हैं, 24 प्रतिशत की मोटी ब्याज दर वसूल कर रहे हैं. लघु वित्त व्यवसाय चौतरफा फल-फूल रहा है.

इंडिया माइक्रोफाइनेंस रिपोर्ट 2009 हमें बताती है कि लघु वित्त व्यवसाय 97 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और इस सेवा का लाभ उठाने वालों की संख्या में 60 फीसदी वृद्धि हुई है. एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, एसकेएस माइक्रो फाइनेंस उड़ीसा, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में करीब 24 प्रतिशत ब्याज वसूल रहा है, इक्विटास माइक्रो फाइनेंस 21 से 28 प्रतिशत ब्याज हासिल कर रहा है और बेसिक्स माइक्रोफाइनेंस लघु ऋण 18 से 24 प्रतिशत ब्याज दर पर दे रहा है. लघु वित्त के क्षेत्र में अभूतपूर्व संवृद्धि हमें बताती है कि खेल के नियम बदलने पर भी गांवों के गरीबों का शोषण पूर्ववत जारी है.

लघु वित्त संस्थानों ने ऋण कथा के खलनायकों-साहूकारों का धंधा एक नए संगठित महाजन तंत्र के हाथों में सौंप दिया है. ये कोई साधारण साहूकार नहीं हैं, बल्कि सुशिक्षित व्यावसायिक वर्ग है, जो मार्केटिंग के तमाम हथकंडों से लैस है. इतना भारी ब्याज वसूल करके लघु वित्त संस्थान वस्तुत: गरीबों की कमर तोड़ देते हैं.

भारतीय रिजर्व बैंक के महज मूकदर्शक बने रहने पर हैरत होती है. प्रकट रूप में आरबीआई को केवल बैंकों के स्वास्थ्य की चिंता है, क्योंकि उपभोक्ता का आधार बनाए बिना ही वे 12 प्रतिशत की सुनिश्चित आय हासिल कर लेते हैं. मुझे इसमें कोई कारण नजर नहीं आता कि आरबीआई बैंकों को अधिकतम दो प्रतिशत ब्याज वसूलने को बाध्य न कर सके और लघु वित्त संस्थानों को गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों से अधिकतम अतिरिक्त दो प्रतिशत ब्याज लेने की अनुमति दे. कोई भी लघु वित्त संस्थान यदि गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों से 4 प्रतिशत से अधिक ब्याज दर वसूल करता है तो इसे अपराध माना जाए.
गरीबों का खून चूसने वाले इन लघु वित्त संस्थानों को अब अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. इसके लिए भारी बदलाव करने पड़ेंगे, किंतु सरकार को गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को उचित ब्याज दर पर ऋण मुहैया कराने के उपाय करने चाहिए. इस व्यवस्था में सुधार लाए जाने पर मैं यह पक्के तौर पर कह सकता हूं कि ऋण लेने के कुछ सालों में ही गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले भी कार चलाते देखे जा सकेंगे.

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