Friday, January 7, 2011

कश्मीर और तिरंगा...


आज कल एक न्यूज़ पढ़ रहा हु की भारतीय जनता पार्टी, जो की अपने गुटबाजी और नजदीक के फायदे के चक्कर में दूर का नुकसान न देख सकने की वजह से देश में लगातार सिकुड़ती जा रही है, वो तो भला हो गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड का का जिन्होने शान बनाये रक्खी है और हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनावों के 90% की सफलता दर का भी जिक्र करना समीचीन होगा ने अपनी प्रासंगिकता और सुर्खियों में रहने के लिए नया लेकिन प्रासंगिक टोटका खोजा, पदयात्रा और कश्मीर के लाल चौक पर झंडा रोहन..

तो भाई, भारतीय जनता पार्टी के युवा नेता और सांसद अनुराग ठाकुर ने निशचय किया की वो कोलकाता से कश्मीर तक भारत की अखंडता के लिए एक पदयात्रा निकालेंगे और श्रीनगर के ऐतिहासिक विख्यात या कुख्यात जो भी कह ले, लाल चौक पर तिरंगा फहराएंगे, एक नजर देखने में तो ये एक सीधी सी योजना लगती है और इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता लेकिन व्यक्तिगत रूप से घाटी के जो हालत है उससे मुझे भी लगता है की ये समय सही नहीं था, लेकिन अब इस कदम ने एक बहुत बडे़ विवाद को जन्म दे दिया

समस्या की शुरुआत हुई एक देशद्रोही, कश्मीर के गली के कुत्ते यासीन मालिक नाम के गद्दार के इस बयान से की लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहराने देंगे,
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_7133622.html


जैसे की लाल चौक इनके पिताजी ने इन्हे बपौती छोडी़ हो...लेकिन मुझे लगा की जैसे भारत सरकार कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानती है और हाल ही में सपा नेता मोहम्मद आज़म खान के उस बयान पर की गुलाम नबी आजाद तो कश्मीरी है, भाजपा के ही साथ कांग्रेस के सभी देश और प्रदेश स्तर के नेताओं ने खूब फुदक मचाई थी और भारत को कश्मीर का अभिन्न अंग बताया और आज़म साहब और समाजवादी पार्टी पर बयानों की बम वर्षा कर दी तो मुझे लगा की शायद अब बेचारे मानसिक रोगी, विक्छिप्त यासीन को जेल में दाल दिया जाय और लाल चौक पर मुख्यमंत्री खुद जाय तिरंगा फहराने..

लेकिन आश्चर्य !!!!!!! जम्मू- कश्मीर का बच्चा सा मुख्यमंत्री फुदका और उसने कहा की अगर लाल चौक पर भारतीय तिरंगा फहराया गया तो हालत बिगड़ जायेंगे और उसकी जिम्मेदारी भाजपा की होगी..

http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_7134304.html

सुन कर मै आश्चर्यचकित रह गया...आखिर किस तरह के लोकतंत्र में रहते है हम जहा अपने देश में अपना राष्ट्रिय ध्वज नहीं फहराया जा सकता.....क्यों एक दो कौडी़ का गुंडा पाकिस्तान का ध्वज फहरा सकता है और भारतीय ध्वज फहराए जाने पर धमकी देने की हिम्मत कर सकता है....क्यूँ नहीं ऐसे लोगो को जेल में डालना चाहिए, या नजरबन्द कर देना चाहिए और या फिर गोली मार देनी चाहिए...क्यों ज्यादातर कश्मीरी मुस्लिम युवा आतंकवादी मार दिए जाते है जिन्हे की सुधार जा सकता है और आतंकवाद की नर्सरी ये कुत्ते देश के पैसे और सुविधाए खाकर नेता बने रहते है..
.आखिर कब तक हम पत्तिया तोड़ कर पेड़ के गिरने का इंतजा़र करेंगे, क्यों नहीं पेड़ की जड़ को ही काट दिया जाता ??

एक भारतीय होने के नाते मै महसूस करता हु की अब भाजपा भले ही अपने कार्यक्रम से हट जाये लेकिन जम्मू कश्मीर और भारत सरकार को लाल चौक पर झंडा फहराना चाहिए और ये भी जनता हु की ज्यादातर कश्मीरी भी इस बात से सहमत होंगे सिर्फ यासीन और उसके जैसे कुछ देशद्रोहियों के अलावा, ये वक़्त है साबित करने के की कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है.....और अगर कांग्रेस या अब्दुल्लाह साहब देश के मुकुट को नहीं संभाल सकते तो सिर्फ कोरी बयान बाजी और अखबारों में कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताना बंद करे....

Monday, December 13, 2010

लोकतंत्र के राजा.....

राजतंत्र नहीं रहा, उसकी जगह प्रजातंत्र आ गया, लेकिन अंतर क्या आया? अब एक राजा की जगह कई राजा मिल कर आम आदमी का शोषण करते हैं, वह भी इतनी सफाई से कि आम आदमी को भनक तक नहीं लगती. कुछ ऐसे ही राजाओं की ख़बर ली है चौथी दुनिया ने. आरटीआई से मिली सूचना के मुताबिक़, इन राजाओं की प्यास बुझाने के लिए आम आदमी को अपनी करोडों़ की कमाई गंवानी पड़ रही है. अपना घर अंधेरे में रखकर राजाओं के आलीशान महलों (मुख्यमंत्री आवास) को रोशन कर रहा है आम आदमी. खु़द के सिर पर छत नहीं, लेकिन वह इन राजाओं के महलों की पेंटिंग पर ही लाखों रुपये ख़र्च कर रहा है.

राज्य के मुख्यमंत्री भी जनता की जेब ढीली कर सुख-सुविधा भोगने में पीछे नहीं हैं. वह भी तब, जब दिल्ली जैसे शहर में 80 हजा़र से ज़्यादा लोगों के सिर पर छत नहीं है. विदर्भ में अब तक 2 लाख से ज़्यादा किसान असमय मौत को गले लगा चुके हैं. उत्तर प्रदेश में हर साल सैकडों़ बच्चे इंसेफ्लाइटिस की वजह से दम तोड़ देते हैं, लेकिन इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की जीवनशैली पर नज़र डालें तो एक अलग ही तस्वीर दिखाई देती है. चमक-दमक से भरपूर तस्वीर. बिल्कुल इंडिया शाइनिंग की तरह. जिस देश की एक बडी़ आबादी को पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं, वहीं इन राज्यों में से एक के मुख्यमंत्री आवास का पानी का बिल 62 लाख रुपये आए तो इसे आप क्या कहेंगे? उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र के कितने गांवों तक बिजली पहुंची है. और अगर पहुंचती भी है तो कितने घंटों के लिए, यह रिसर्च का मामला हो सकता है, लेकिन इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री अपने आवास को रोशन करने के लिए महीने में 20 लाख रुपये से ज़्यादा बिजली पर ख़र्च कर देते हों तो इसे आप क्या कहेंगे? चौथी दुनिया ने उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री आवास पर होने वाले ख़र्च का ब्योरा आरटीआई के ज़रिए जुटाया है. प्राप्त सूचना के विश्लेषण से पता चलता है कि कैसे आम आदमी की गाढी़ कमाई इन राज्यों के मुख्यमंत्री आवासों पर बेहिसाब ख़र्च की जा रही है.

प्रधानमंत्री भले ही अपने मंत्रियों को विदेश दौरे न करने, सरकारी ख़र्च घटाने की सलाह देते रहते हैं, लेकिन महाराष्ट्र में उन्हीं की पार्टी के मुख्यमंत्री अपने आवास की रंगाई-पुताई पर पांच सालों में 86 लाख रुपया पानी की तरह बहा देते हैं. उत्तर प्रदेश में मायावती की शाही आदत के मुताबिक़ ही उनके आवास के रखरखाव पर बेशुमार पैसा ख़र्च किया जा रहा है. और यह सब कुछ हो रहा है एक ऐसे देश में, जहां का हर तीसरा नागरिक ग़रीब है. 70 फीसदी आबादी की रोज की आय 20 रुपये से भी कम है. ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2009 के आंकडों़ के मुताबिक़, भारत में भूखे एवं कुपोषित लोगों की संख्या पाकिस्तान, नेपाल, सूडान, पेरू, मालावी और मंगोलिया जैसे देशों से भी ज़्यादा है. पांच साल से कम उम्र के अंडरवेट (उम्र के हिसाब से कम वजन) बच्चों की सूची में भारत की हालत बांग्लादेश, पूर्वी तिमोर और यमन जैसी है.

भारत में नाइजीरिया के मुका़बले ज़्यादा भूखे और कुपोषित लोग हैं. देश की राजधानी दिल्ली की जन वितरण प्रणाली के तहत ज़्यादातर ग़रीब परिवारों के पास राशनकार्ड नहीं हैं. एपीएल कोटे वाले के पास बीपीएल कार्ड हैं. उत्तर प्रदेश एवं महाराष्ट्र में किसान मर रहे हैं, लेकिन इस सबसे बेपरवाह हमारे माननीय मुख्यमंत्रीगण इसी धरती पर स्वर्ग का मजा़ ले रहे हैं.

यह सब कुछ एक ऐसे देश में हो रहा है , जहां का हर तीसरा नागरिक ग़रीब है. ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2009 के आंकडों़ के मुताबिक़, भारत में भूखे एवं कुपोषित लोगों की संख्या पाकिस्तान, नेपाल, सूडान, पेरू, मालावी और मंगोलिया जैसे देशों से भी ज़्यादा है. अंडरवेट बच्चों की सूची में भारत की हालत बांग्लादेश, पूर्वी तिमोर और यमन जैसी है. जन वितरण प्रणाली के तहत ज़्यादातर ग़रीब परिवारों के पास राशनकार्ड नहीं हैं. उत्तर प्रदेश एवं महाराष्ट्र में किसान मर रहे हैं. लेकिन हमारे माननीय मुख्यमंत्रीगण इसी धरती पर स्वर्ग का मजा़ ले रहे हैं.

Saujany-चौथी दुनिया

Saturday, November 27, 2010

कांग्रेस, भारत का अभिशाप..

जब मै बच्चा था तो अक्सर सुनता था की कांग्रेस सरकार घोटालो की सरकार होती है म और जब भी कांग्रेसी सत्ता में आते है देश में महंगाई, भ्रष्टाचार रॉकेट स्पीड से बढ़ जाता है, लेकिन तब मुझे ये बाते समझ में नहीं आती थी, आज जब देश में पिछले छ सालो से कांग्रेस की सरकार है और देश में चारो तरफ अराजकता का बोल बाला है, एक के बाद पडोसी देशो से सम्बन्ध खराब होते जा रहे है, चाइना देश में घुसा आ रहा है और देश की जमीन पर धीरे धीरे कब्जा़ करता आ रहा है, महंगाई तो अभूतपूर्व तरीके से बढती जा रही है और इसके लिए प्रधानमंत्री और उनके सेनापति प्रणव डा के दो पेट संवाद सुन रहा हू
*अन्तराष्ट्रीय महंगाई की वजह से देश में महंगाई बढी़ है
*हम महंगाई पर जल्द काबू पा लेंगे
पहले का जवाब तो ये है की पूरे यूरोप में मैंने पिछले सालो में आर्थिक मंदी की वजह से चीजो के दाम सिर्फ घटते देखे सिर्फ भारत अपवाद रहा जहा मंदी तो आई, लाखो नौकरिया गयी, हा दाम लगातार बढ़ते रहें अब इसकी दूसरी वजह रही जमाखोरी कालाबाजारी और माननीय गृहमंत्री का गेहू और चीनी आयत , निर्यात कारनामा जिसे टुकडो़ के लालच में सरकार का पूरा समर्थन था.
महंगाई तो घटी नहीं इसका इंतजा़र करते करते ६ साल में एक बुजुर्ग पीढी़ जरूर घट गयी होगी,

फिर देखा की किस तरह अफज़ल गुरु, कसाब जैसे देशद्रोहियों को देश का मेहमान बनाया गया , कैसे कांग्रेस के शहपर राज ठाकरे नाम के विछिप्त ने उत्तर भारतीयों के जान तक लेने में संकोच नहीं किया और एक भय, आतंक और गृहयुद्ध जैसा माहौल बना दिया अपने ही देश में लोग बेगाने हो गए..और वोट बैंक के लालच में कांग्रेस ने उसे शह देना जारी रक्खा, देखा की कैसे संवैधानिक मजबूरियों को सोनिया जी के त्याग का नाम देकर और जरखरीद गुलाम मीडिया हाउस को पद्मश्री और विज्ञापन जैसे हड्डी के टुकडे देकर इसे बहुप्रचारित करवाया गया , जिस प्रदेश में उत्तर भारतीयों की जाने जाते वक़्त एक भी पुलिस वाला बाहर नहीं दिखा उसी प्रदेश में एक "हीरो नुमा जीरो " बाबा बहादुर के जाने पर सारी पुलिस और सेना के साथ मुख्यमंत्री तक सडको पर लोट गए.

यहाँ तक तो फिर भी ठीक था फिर कांग्रेस ने शुरू किया वो खेल जो गाँधी परिवार ने बहुत पहले छोटे स्टार पर शुरू किया था , तस्करी और भ्रष्टाचार...शुरुआत शरद पवार जी के गेहू और चीनी घोटाले से हुई लेकिन दूसरी बार पता नहीं एक भ्रष्ट चुनाव आयुक्त और इ वी एम मशीनों की मेहरबानी या जनता की गलती से संप्रग फिर सत्ता में आई हा कुछ बदलावों और खतरनाक इरादों के साथ तो आते ही सत्ता दर्प और भ्रष्टाचार का वो माहौल दिखाया की जनता की रूह काँप जाए..नीरा रादिया, वोर संघवी और बरखा दत्त जैसे दलाल मंत्रिपरिषद बनाने लगे और हमारे कठपुतली प्रधानमंत्री जी बस पूंछ हिलाते रहे..

शुरुआत हुई ७०,००० करोड़ के राष्ट्रमंडल खेलो से जिसे जनता अब कहती है, और तमाम याचिकाओं, शिकायतों के बावजूद सरकार कान में तेल डाले रही क्युकी हिस्सा तो आला कमान से नीचे तक सबको मिल रहा था.. उसके बाद पता लगा की शहीदों की विधवाओं के नाम पर बने फ्लैट को कांग्रेसी नेताओं , मुख्यमंत्री और सेना के अफसरों ने अपने बाप का माल समझ लिया...और सास से लेकर दामाद तक सबको उपकृत किया गया..
उसके बाद आया वो घोटाला जिसने जनता की नेताओं के बारे में विश्वास को हिलाकर रख दिया, भारत के इतिहास का सबसे बडा़ घोटाला जिसने देश के खजाने को १,७६, ००० करोड़ का नुकसान पहुचाया...और अब सबसे नया फर्जी हाऊसिंग लोन घोटाला...और मजे की बात तो ये की कांग्रेस खुद को पाक साफ़ तो कहती है हा जाँच नहीं करना चाहती, और अगर हो भी तो खुद ही करना चाहती है,,क्युकी केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त वैसे भी कांग्रेस ने एक आर्थिक अपराधी को ही बनाया है तो चोर चोर मौसेरे भाई...

अंत में इतना ही कहना चाहूँगा की आज इन घोटालो की वजह से देश में चारो तरफ एक अराजकता, एक हताशा का माहौल है, लेकिन कभी कभी लगता है की कही ये तूफा़न के आने के पहले की शांति तो नहीं , कही ऐसा तो नहीं की एक दिन जनता उट्ठे और इन सत्ताधीशो के खिलाफ कानून हाथ में ले ले वैसे बिहार में भ्रष्टाचार का जवाब मिल गया है और शायद आगे भी जनता साबित कर दे की वो बेवकूफ नहीं है...

चलते-चलते ---श्री सुब्रह्मण्यम स्वामी जी के अनुसार 2G घोटाले में ६०,००० करोड़ रिश्वत के तौर पर बनते गए जिसमे से १० संचार मंत्री ए रजा तथा ३०:३०:३० करूणानिधि तथा सोनिया गाँधी की दो बहनों नाडिया और अनुष्का के खाते में गए...

जय हो..

Tuesday, June 8, 2010

गरीब देश के अमीर सच

भारत एक गरीब देश है। यहां गरीबी की सरकारी रेखा के नीचे तीस करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं जितनी इंग्लैंड की आबादी भी नहीं है। कालाहांडी में भूख से हर साल लोग मरते हैं और जो लोग बच जाते हैं वे दूर दूर के शहरों में कहीं रिक्शा चलाते हैं तो कहीं मजदूरी करते हैं।
पर क्या वास्तव में भारत एक गरीब देश है? मैं आपको भारत के साधनों, संसाधनों, संस्कृति और एक जमाने में सोने की चिड़िया वाला प्रवचन देने नहीं जा रहा। आपको एक सच बताना है और वह सच यह है कि अगर काला धन स्विस बैंकों में रखना अगर ओलंपिक या कॉमनवेल्थ का कोई खेल होता तो भारत एक झटके में रूस, अमेरिका और चीन सबको परास्त कर देता।
स्विट्जरलैंड में भारतीय लालाओं और नेताओं का जो काला धन जमा हैं उसकी अगर टॉप 5 की सूची बनाई जाए तो भारत सबसे शिखर पर हैं। अमेरिका तो बेचारा इतना पैसा होने के बावजूद टॉप 5 में नहीं है। वैसे भी अमेरिका के लोग स्विस बैंक की बजाय पाकिस्तान, अफगानिस्तान और इराक पर पैसा खर्च करना ज्यादा पसंद करते है। अच्छी खबर यह है कि बहुत लंबी कसरत के बाद स्विजट्जरलैंड की सरकार भारत के लोगों द्वारा वहां जमा पैसा बताने और शायद वापस करने पर राजी हो गई है। एक मोटे आंकड़े के हिसाब से पंद्रह सौ अरब डॉलर से ज्यादा काला धन विदेशी बैंकों में जमा हैं और यह रकम भारत पर सारे विदेशों कर्जों से तेरह गुना ज्यादा है।
यह रकम मधु कोडा जैसे नेताओं की हैं, भ्रष्ट आईएएस, आईआरएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों की है। आप अगर वीजा और पासपोर्टो की सूची बनाएं तो ये लोग सबसे ज्यादा यात्राएं स्विट्जरलैंड की ही करते हैं और वे सिर्फ वहां की सुंदरता देखने नहीं जाते। अगर यह सारा पैसा वापस आ जाए तो भारत में 45 करोड़ लोगों को एक एक लाख रुपए मिल सकते हैं और गरीबी की सीमा रेखा कब की गायब हो जाएगी। 24 घंटे में हम सारा विदेशी कर्ज उतार सकते हैं और इसके बाद भी हमारे पास अपार पैसा बचा रह जाएगा। सिर्फ इसके ब्याज से भारत का सालाना बजट पेश किया जा सकता हैं।
जाहिर है कि अपने देश में कुछ के पास है तो बहुत हैं और बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो भूखे रहने पर मजबूर हैं और उनके बच्चे मजदूरी करते हैं।गरीबी और अमीरी के बीच जो खाई है उस पर पुल बनाने की कोई कोशिश नहीं की गई। क्योंकि अगर पुल बन जाएगा तो भूखे मर रहे लोग इस पार के समाज में आ जाएंगे और जब देखेंगे कि उनकी कीमत पर ये समाज इसके कुछ लोग ऐश कर रहे हैं तो उनकी मुद्रा हमलावर होगी

Friday, May 28, 2010

दरिद्र प्रदेश में दौलत की देवी

मालामुर्ती क्षमा कीजियेगा मायावती ‘दलित की बेटी’ होने के विशेषण का इजहार करते हुए अपने विरोधियों को सियासत के मैदान में चुनौती देती हैं और विरोधी जवाब में उन्हें ‘दौलत की बेटी’ के विशेषण से नवाजा करते हैं। दोनों ही विशेषण अपनी जगह सौ फीसदी सही हैं। मायावती जन्मना दलित की बेटी हैं और कर्मणा वह दौलत की बेटी बन चुकी हैं।

बेचारी उत्तर प्रदेश की जनता चाहे तो उन्हें ‘दौलत की देवी’ कह ले! बसपा की मुखिया मायावती ने मुख्यमंत्री की हैसियत से प्रदेश वासियों की झोली में चाहे कुछ दिया हो या न दिया हो, लेकिन इतना तो बड़े भरोसे से कहा जा सकता है कि सूखा और बाढ़ की चक्की में पिसते प्रदेश की गरीब जनता ने उन्हें करोड़पति बना दिया है। वह भी कोई छोटा-मोटा करोड़पति नहीं, ऐसा करोड़पति जो तेजी से अरबपति होने की राह पर चल रहा है।

महज तीन बरस में उनकी सम्पत्ति में 34 करोड़ का इजाफा हुआ है। उत्तर प्रदेश की विधान परिषद के लिए द्विवार्षिक चुनाव का नामांकन करते हुए दलित की बेटी मायावती ने अपनी सम्पत्ति का जो ब्यौरा दिया है, उसके मुताबिक उनकी दौलत पिछले तीन सालों में 52 करोड़ रुपए से बढ़कर 87 करोड़ रुपए हो गई है। इसका मतलब यह हुआ कि उनकी हर महीने की औसत आमदनी लगभग तीन करोड़ रुपए के बराबर रही। अपने आप में यह कम दिलचस्प नहीं है कि इन बरसों में जब समूची दुनिया समेत अपने देश की अर्थव्यवस्था भी घनघोर मंदी के भंवर में ऊभचूभ कर रही थी और बड़े-बड़े उमियों के पसीने छूट रहे थे, तब भी मायावती की दौलत का ग्राफ उत्तरोत्तर ऊंचाई की सीढ़ियां चढ़ता रहा।

इसका एक अर्थ तो यही हुआ कि जनता की सेवा और प्रदेश के निर्माण का जो पारिश्रमिक है, उस पर आर्थिक मंदी और सूखा-बाढ़ जैसे प्राकृतिक प्रकोप का कोई असर नहीं पड़ता!। खैर ये तो वो संपत्ति है जिसको दिखाया गया है , इसके अलावा घोड़ी बछेड़ा की जमीन जिसके लिए 4 किसानो की जान ले ली इस ड्राकुला सरकार ने , बादलपुर की वो अरबो की लागत से बन रही कोठी जिसकी वजह से एक देशभक्त शहीद को घर से बेदखल करने में सारा प्रशाशनिक अमला लगा हुआ है, लखनऊ में जिस जमीन के लिए एक जज के परिवार को मानसिक प्रताड़ना दी जा रही है,विभिन्न जिलो में बसपा नेताओं द्वारा बनाई जा रही बेनामी संपत्तियां और सबसे बड़ी वो करोडो की माला जिसने मायावती को मालामुर्ती बना दिया उसका जिक्र नही है, वरना बात अरबो तक पहुचती.

बहरहाल, वैभव के इस विवरण के सामने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की कुल 50 लाख डॉलर की सम्पत्ति को रखकर देखें तो लगेगा कि अमीरी के मामले में वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के आगे कहीं नहीं ठहरते।

क्या इसका एक अर्थ यह नहीं निकलता कि अमेरिका की तरह जिन देशों के शासनाध्यक्षों की सम्पत्ति संतुलित व सामान्य है, वे देश तो विकास करते हैं, मगर जिस देश के प्रदेशों के मायावती, जयललिता और मधु कोड़ा सरीखे तेजी से अमीर होने वाले चरित्र हीन, धनलोलुप, रक्तपिपासु और मानवता के ऊपर कलंक मुख्यमंत्री हुआ करते हैं, वहां उत्तर प्रदेश-तमिलनाडु-झारखंड जैसे विकास के मोहताज, दर-दर की ठोकर खानेवाले राज्य दिखाई देते हैं। सवाल यह भी है कि किसी शासनाध्यक्ष को उसकी निजी अमीरी के आधार पर उमी-पराक्रमी माना जाए या फिर उसके शासन काल में दुर्गति की दशा भोगते प्रदेश के आईने में उसे फिसड्डी और दरिद्र कहा जाए! ये वही नेता या फिर नेता के नाम पर ...... है जिसने , आपको याद ही होगा कि कुछ महीने पहले जिसके पास दांतेवाडा के शहीदों को देने के लिए पैसे नहीं थे कृपालु महाराज के भंडारे में मामूली खैरात पाने की भगदड़ में मरे लोगों को मुआवजा देने के लिए पैसे न होने की बात मुख्यमंत्री ने वैसे ही सार्वजनिक की थी, जैसे अब अपनी सम्पत्ति की घोषणा की है।

Friday, May 21, 2010

Thursday, May 13, 2010

माया के 3 साल

अाज से तीन साल पहले सारे अनुमानों, आंकड़ों और विश्लेषणों को बलाए ताक कर सवर्जन के एजेंडे को लेकर बसपा ने जिस चमक-दमक के साथ सरकार बनाई, उससे लोगों की उम्मीदें थीं कि अब बहुजन से सर्वजन तक खुशहाली का सावन बरसेगा और विकास की फसल लहलहाएगी। लोगों को यह भी लगा कि यह सरकार पूर्ववर्ती सरकारों से भिन्न होगी। सरकार जब अपनी नीतियों, कार्यक्रमों, प्राथमिकताओं, नियोजनों पर चलने लगी तो नौकरशाहों, चापलूस प्रवृत्ति के लोगों की गिरफ्त में फंसती चली गई। समाज के दबे कुचले शोषित वंचित और उपेक्षित तथा समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति पर होठों पर मुस्कान लाने का संकल्प किताबी साबित हुआ। उसके दो वक्त की रोटी, स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा पाने का मकसद आज भी एक ख्वाब से ज्यादा कुछ नहीं है।

ऐसे में किसी शायर की यह पंक्तियां प्रासंगिक लगती हैं -
"बहुत आगे बढ़े हैं काफिले वाले हकीकत है,
मगर मंजिल की जो दूरी पहले थी सो अब भी है"

पुष्टि होने लगी कि इस सरकार का लक्ष्य मात्र राजधानी लखनऊ को पत्थरों की मूर्तियों से पाट देना और विरोधी दलों के प्रति प्रतिशोध से काम करना तथा रोज-रोज अधिकारियों के तबादलों, दूसरे दलों के अपराधी और अराजक तत्वों को बसपा में शामिल करना भर रह गया है। उस पर बसपा का मासूमियत भरा हास्यास्पद यह बयान कि विपक्षी दलों ने आपराधिक तत्वों को बसपा में भेज दिया। सवाल यह उठता है कि क्या बसपा नेतृत्व सत्ता पाने के बाद इतना नादान हो गया कि उसका विवेक अच्छे और बुरे की पहचान करने तक की क्षमता खो बैठा।

राजनीतिक क्षेत्रों में प्रशासनिक निरंकुशता और भ्रष्टाचार बढ़ते अपराध का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है।बल्कि एक ओर बढ़ती महंगाई, चोरबाजारी खा पदार्थो में मिलावट, दूसरी ओर बसपा नेतृत्व करोड़ों रुपयों का हार पहनकर मीडिया में अपनी तस्वीरे छपवाए। यह कृत्य आम जीवनोपयोगी चीजों को तरसती जनता के घावों पर नमक छिड़कने जैसा रहा है। पानी, बिजली, स्वास्थ्य और किसानों, मजदूरों व अन्य वर्गो की समस्याओं से जूझती जनता से बेपरवाह मायावती सरकार केन्द्र सरकार से बात-बात पर रार ठान रही है। अपनी छवि बचाने के लिए विरोधी दलों पर अनर्गल प्रलाप कर रही है। दलित शोषित उपेक्षित भी हैरान हैं कि इस सरकार में उन्हें मिला क्या? वे तो जहां के तहां, बल्कि और पीछे धकिया दिए गए। बसपा कांग्रेस की देखादेखी दलित प्रेम का ढोंग दिखा रही है मगर उनके विकास उत्थान के लिए कुछ नहीं कर रही है। उसकी स्थिति तो अब यही है कि -
‘परछाइयों के शहर में तन्हाइयां न पूछ
अपने शरीके गम में कोई अपने सिवा न था’

सवाल यह उठ रहे हैं कि किस बिना पर इस सरकार को सफल सरकार माना जाए। जहां बात-बात पर आम आदमी को इंसाफ के लिए सरकार के बजाए जनहित याचिकाओं के जरिए न्यायालय की शरण में जाना पड़े। सरकार असंवेदनशीलता से चल रही है फिर भी सरकार का दावा कि सर्वजन की सरकार जनहित में कार्य कर रही है। उसका यह दावा थोथा एवं बड़बोलापन नहीं तो और क्या है।

कांग्रेस हो या भाजपा यह सब अपना मुंह बड़ी बेबाकी से तभी खोलते हैं जब उनके कार्यकर्ता पर कोई सरकारी दबाव आता है। आज उत्तर प्रदेश में सपा को छोड़कर विपक्ष में ऐसा कोई दल नहीं है जो अपने बल पर 2012 में सरकार बनाने का दावा कर सके। बसपा सरकार की यही सफलता मानी जा रही है और निरंकुशता और मनमानी की वजह भी यही है। यह विडम्बना ही मानी जाएगी कि वर्तमान सरकार ने कई बार राज्यपाल तक से टकराने की कोशिश की है और जहां भी उसने अपना कोई अहित होने का खतरा देखा वहीं उसने तुरंत केंद्र सरकार की हां में हां मिलाने में देर नहीं की। इसमें कोई दो राय नहीं कि जैसी बसपा की कार्यशैली है उसमें वह सबसे बड़ा खतरा सिर्फ उत्तर में सपा से महसूस कर रही है।

Tuesday, May 11, 2010

मूर्तियों के बाद मायावती को चाहिए एक हेवली

मायावती का मूर्ति प्रेम तो जगजाहिर है ही बहन जी महलों की भी शौकीन हैं॥अपने महल की खातिर मायावती दूसरे के घरों पर भी कब्जा करने से गुरेज नहीं कर रहीं हैं। ये हम नहीं कह रहे हैं बल्कि हालात कुछ यही बयां कर रहे हैं | बादलपुर में जज की कोठी का मामल अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि बहन जी के सर एक और इल्जाम लग गया है। कहने वाले तो यही कह रहे हैं कि लखनऊ में एक पूर्व जज की कोठी पर बहन जी की तिरछी नजर है॥तभी तो रात के अंधेरे में एलडीए के गार्ड इस कोठी में कूद गए और जबरन अपना तंबू गाड़ने दरअसल ये कोठी जस्टिस नियामतुल्लाह ने बनवाई थी॥जस्टिस नियामतुल्लाह वहीं है॥जिन्हें पाकिस्तान बनने के बाद वहां के अटार्नी जनरल बनने का ऑफर मिला था।लेकिन उन्होंने हिंदुस्तान से बेंइंतहा मोहब्बत होने की खातिर जिन्ना से मिले इस ऑफर को ठुकरा दिया और इस कोठी में बाकी की जिंदगी गुजारना पंसद किया॥परिवार को वही यादें इस कोठी से जुडी है।

बात साफ है कि राजधानी के पॉश मॉल एवेन्यू इलाके में इस कोठी के ठीक बगल में मायावती का घर है और सामने बहुजन समाज पार्टी का दफ्तर अब ज्यादा क्या समझाना जहां मायावती का घर और दफ्तर हो वहां किसी और की कोठी भला कैसे रह सकती है॥लेकिन अपनी पुश्तैनी कोठी को बचाने की खातिर अब्दुल्लाह परिवार की पत्रकार बहु मैदान में डटी है

परिवार वालों का आरोप है कि राज्य में कई सरकारें आई और गई॥ लेकिन हालात ऐसे नहीं थे॥ बहन जी के राज में जीना मुश्किल हो गया है॥जिस पर लोगों की हिफाजत का जिम्मा है॥जब वहीं लोगों के सिर का छत छीनने लगे तो ऐसे में आम आदमी किससे फरियाद करे!

रात के अंधेरे में लखनऊ डेवलपमेंट ऑथारटी ने चोरों की तरह॥ सुरक्षाकर्मियों को जस्टिस नियामतुल्ला की कोठी पर कब्जा करने की खातिर भेजा॥लेकिन पुलिस के मौके पर पहुचंने के बावजूद इस गैर-जिम्मेदाराना कार्रवाई के लिए एलडीए के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है

एलडीए के वही सुरक्षाकर्मी हैं॥ जो देर रात मॉल एवेन्यू में रिटायर जज नियामतुल्लाह की कोठी में दीवार कूदकर दाखिल हो गए थे हलांकि मीडिया और पुलिस के मौके पर पहुंचने के बाद ये सभी वहां से निकल भागे॥ लेकिन मीडिया और पुलिस के जाते ही ये सुरक्षाककर्मी फिर से कोठी में घुस गए मगर मीडिया वालों के पहुंच जाने से जब इनकी जान पर बन आई तो अब ये एलडीए के वीसी यानी उपाध्यक्ष मुकेश मेश्राम का नाम लेने से भी नहीं हिचकिचा रहे थे।

Tuesday, May 4, 2010

राजनीति की नूरा कुश्ती में जनता को पटखनी

मंहगाई समेत कई मुद्दों पर संसद मे लाया जाने वाला कट ऑफ मोशन देश की राजनीति और राजनीतिकि दलों के चेहरो को बेनक़ाब करने का सबसे बेहतरीन सबूत बन कर रह गया है। अपनी परेशानियों और सत्ता पक्ष की मनामानी का विरोध करने के लिए जनता विपक्ष से ही आस लगाती है। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी साफ हो गया है कि भ्रष्टाचार हो या मंहगाई हर मामले में सभी राजनीतिक दल एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं।

सियासी पंडितो की राय में मधु कोड़ा हो या चारा घोटाला, पडित सुखराम हो या बोफोर्स, घोटाले सामने तो आए लेकिन उनके नतीजे दबा दिये जाते हैं। बल्कि कुछ लोगो का तो यहां तक कहना है कि एक दूसरे के घोटालों और जाच ऐंजेसियों के दम पर सभी राजनीतिक दल एक दूसरे से समझौते से लेकर ब्लैक मेंलिग तक का खेल खेलते हैं। इसका सबूत एक बार फिर दिल्ली और लखनऊ के बीच खेली गई सियासी नूरा कुश्ती को देखने से मिला। बिन हवा के गुब्बारे की तरह हो चुके विपक्ष ने सरकार को संसद में घेरने के लिए गुब्बारे में हवा भी भरी और तैयारी भी ज़ोर शोर से की तो थी। मगर लखनऊ में माया मेम साब ने पूरे विपक्ष के गुब्बारे में इतने छेद कर दिये कि गिनती भी मुश्किल हो गई।

माया मेम साब ने सरकार के विरोध से इंकार कर दिया। हो सकता है कि मैडम सरकार गिराने या दोबारा चुनाव को देश हित में ठीक ना मानती हो। और ये भी हो सकता है कि मुद्दे को मुलायम और लालू के अलावा बीजेपी की झोली में ना जाने देने की नीयत से माया मेम साब ने सरकार को अभयदान देने की ठान ली हो।

लेकिन इस सबके बीच ये चर्चाएं बहुत ही अहम हैं कि केद्र की काग्रेस सरकार ने मैडम के खिलाफ सीबीआई को एक बार फिर टूल की तरह इस्तेमाल किया है। यानि आय से अधिक सम्पत्ति मामले के अलावा कुछ और घोटालों के मामलों में काग्रेस ने माया मेम साब को मदद करने का गुपचुप समझौता कर लिया है। इतना ही नहीं चर्चा तो ये भी है कि इन सभी मामलों को दबाने के अलावा उनके खिलाफ अपील तक ना करने का वादा काग्रेस ने मेम साब से कर लिया है।
देश और जनता के साथ इससे ज़्यादा शर्मनाक मज़ाक़ हो ही नही सकता।
भले ही मायावती के हर क़दम का विरोध करके उत्तर प्रदेश की जनता के लिए घड़ियाली आंसू बहाने वाले राहुल के बारे मे राजनीतिक हल्कों में कहा जा रहा है कि ज़मीन से तीन फुट ऊपर चलने से बदलाव नामुमकिन है। साथ ही राज्य की दुर्दशा के लिए केंद्र को कोसने वाली माया मेम साब भी जनता के साथ क्या कर रही हैं अब के सामने आ चुका है।

पिछले 63 साल से देश के साथ काग्रेस क्या कर रही है इसकी बानगी भर है ये ताज़ा मामला। लोगों का आरोप है कि सत्ता के लालच में काग्रेस किसी भी हद तक जा सकती है। देश के लिये सबसे खतरनाक दीमक बन चुके किसी भी भ्रष्टाचार को किसी भी रूप में पनाह दने के आरोपो के बीच काग्रेस जनता की जवाबदही से कैसे बचेगी ये उसके मैनेजर ही जाने।

लेकिन ये कहां तक उचित है कि बाबा साहब और काशीराम के मार्ग दर्शन से मान सम्मान की लड़ाई लड़ रहे कमज़ोर तबक़े के नाम पर बनी सरकार के नुमाइंदे अपने स्वार्थों के लिए उसी काग्रेस के सामने घुटने टेक दें जिसका विरोध ही उसकी राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा रहा हो। और फिर मुलायम लालू शरद और आड़वाणी समेत सभी नेताओं के चरत्रि को देख कर यही लगता है कि जनता जाए भाड़ में सत्ता और स्वार्थों के लिए हर समझौता जायज है.

Saturday, May 1, 2010

सीबीआई और महंगाई।

केंद्र की काग्रेसी सरकार के पास दो बड़े अचूक हथियार हैं। एक का नाम है सीबीआई और दूसरा है महंगाई। वह सीबीआई के जरिए विरोधियों को समर्थक बनाती है और महंगाई के जरिए समर्थक उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाती है। काग्रेस, महंगाई और सीबीआई तीनों सगी बहने हैं।