Thursday 13 May 2010

माया के 3 साल

अाज से तीन साल पहले सारे अनुमानों, आंकड़ों और विश्लेषणों को बलाए ताक कर सवर्जन के एजेंडे को लेकर बसपा ने जिस चमक-दमक के साथ सरकार बनाई, उससे लोगों की उम्मीदें थीं कि अब बहुजन से सर्वजन तक खुशहाली का सावन बरसेगा और विकास की फसल लहलहाएगी। लोगों को यह भी लगा कि यह सरकार पूर्ववर्ती सरकारों से भिन्न होगी। सरकार जब अपनी नीतियों, कार्यक्रमों, प्राथमिकताओं, नियोजनों पर चलने लगी तो नौकरशाहों, चापलूस प्रवृत्ति के लोगों की गिरफ्त में फंसती चली गई। समाज के दबे कुचले शोषित वंचित और उपेक्षित तथा समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति पर होठों पर मुस्कान लाने का संकल्प किताबी साबित हुआ। उसके दो वक्त की रोटी, स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा पाने का मकसद आज भी एक ख्वाब से ज्यादा कुछ नहीं है।

ऐसे में किसी शायर की यह पंक्तियां प्रासंगिक लगती हैं -
"बहुत आगे बढ़े हैं काफिले वाले हकीकत है,
मगर मंजिल की जो दूरी पहले थी सो अब भी है"

पुष्टि होने लगी कि इस सरकार का लक्ष्य मात्र राजधानी लखनऊ को पत्थरों की मूर्तियों से पाट देना और विरोधी दलों के प्रति प्रतिशोध से काम करना तथा रोज-रोज अधिकारियों के तबादलों, दूसरे दलों के अपराधी और अराजक तत्वों को बसपा में शामिल करना भर रह गया है। उस पर बसपा का मासूमियत भरा हास्यास्पद यह बयान कि विपक्षी दलों ने आपराधिक तत्वों को बसपा में भेज दिया। सवाल यह उठता है कि क्या बसपा नेतृत्व सत्ता पाने के बाद इतना नादान हो गया कि उसका विवेक अच्छे और बुरे की पहचान करने तक की क्षमता खो बैठा।

राजनीतिक क्षेत्रों में प्रशासनिक निरंकुशता और भ्रष्टाचार बढ़ते अपराध का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है।बल्कि एक ओर बढ़ती महंगाई, चोरबाजारी खा पदार्थो में मिलावट, दूसरी ओर बसपा नेतृत्व करोड़ों रुपयों का हार पहनकर मीडिया में अपनी तस्वीरे छपवाए। यह कृत्य आम जीवनोपयोगी चीजों को तरसती जनता के घावों पर नमक छिड़कने जैसा रहा है। पानी, बिजली, स्वास्थ्य और किसानों, मजदूरों व अन्य वर्गो की समस्याओं से जूझती जनता से बेपरवाह मायावती सरकार केन्द्र सरकार से बात-बात पर रार ठान रही है। अपनी छवि बचाने के लिए विरोधी दलों पर अनर्गल प्रलाप कर रही है। दलित शोषित उपेक्षित भी हैरान हैं कि इस सरकार में उन्हें मिला क्या? वे तो जहां के तहां, बल्कि और पीछे धकिया दिए गए। बसपा कांग्रेस की देखादेखी दलित प्रेम का ढोंग दिखा रही है मगर उनके विकास उत्थान के लिए कुछ नहीं कर रही है। उसकी स्थिति तो अब यही है कि -
‘परछाइयों के शहर में तन्हाइयां न पूछ
अपने शरीके गम में कोई अपने सिवा न था’

सवाल यह उठ रहे हैं कि किस बिना पर इस सरकार को सफल सरकार माना जाए। जहां बात-बात पर आम आदमी को इंसाफ के लिए सरकार के बजाए जनहित याचिकाओं के जरिए न्यायालय की शरण में जाना पड़े। सरकार असंवेदनशीलता से चल रही है फिर भी सरकार का दावा कि सर्वजन की सरकार जनहित में कार्य कर रही है। उसका यह दावा थोथा एवं बड़बोलापन नहीं तो और क्या है।

कांग्रेस हो या भाजपा यह सब अपना मुंह बड़ी बेबाकी से तभी खोलते हैं जब उनके कार्यकर्ता पर कोई सरकारी दबाव आता है। आज उत्तर प्रदेश में सपा को छोड़कर विपक्ष में ऐसा कोई दल नहीं है जो अपने बल पर 2012 में सरकार बनाने का दावा कर सके। बसपा सरकार की यही सफलता मानी जा रही है और निरंकुशता और मनमानी की वजह भी यही है। यह विडम्बना ही मानी जाएगी कि वर्तमान सरकार ने कई बार राज्यपाल तक से टकराने की कोशिश की है और जहां भी उसने अपना कोई अहित होने का खतरा देखा वहीं उसने तुरंत केंद्र सरकार की हां में हां मिलाने में देर नहीं की। इसमें कोई दो राय नहीं कि जैसी बसपा की कार्यशैली है उसमें वह सबसे बड़ा खतरा सिर्फ उत्तर में सपा से महसूस कर रही है।

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