Saturday 16 January 2010

अखबार से जिन्हें आता है बुखार

अगर अाप एक अच्छे डेमोकेट्र हैं और जनतंत्र में आपका भरोसा है तो चाहेंगे कि आपके कामकाज और आचरण की समीक्षा-आलोचना करने वाला कोई मीडिया जरूर हो-अखबार हो। वह इतना निर्भीक भी हो कि कमजोरियों पर उंगली रखता हो। लोकतांत्रिक व्यवस्था में काम करने वाला, खास तौर पर अगर वह सत्ता पक्ष में है तब तो लोकतंत्र का उससे कुछ ज्यादा ही तकाजा बनता है कि वह अखबार को अपनी सरकार की चालढाल का आईना बनाए। अपने शासन-प्रशासन की कमजोरियों, खामियों और स्वेच्छाचारिता को जानता रहे और उनका इलाज भी करे। आखिर चौथे खंभे की महत्ता और मर्यादा भी तो यही है। लेकिन अगर लोकतंत्र को पाखंड बना दिया जाए और निहित स्वार्थ व लोभ-लाभ के पुतले बने दरबारियों को ही आंख-कान बना लिया जाए, तब तो वही होगा जो उत्तर प्रदेश के मौजूदा निजाम में हो रहा है। अखबार से जिन्हें बुखार आता हो, वे चाहे और कुछ भी हों, लोकतांत्रिक नहीं हो सकते। सर्व समाज तो छोड़िए ऐसे लोग किसी समाज के लायक नहीं हो सकते। तानाशाही मिजाज रखनेवालों को भला समाज और लोकतंत्र से क्या लेना-देना। शासन-प्रशासन के कारनामों को बेबाक ढंग से लगातार उजागर करने वाले हिन्दी दैनिक डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट के चेयरमैन व प्रबंध संपादक डॉ. निशीथ राय को लखनऊ विश्वविालय स्थित रीजनल सेंटर फॉर अर्बन एंड इन्वायरमेंटल स्टडीज के निदेशक के नाते आवंटित सरकारी आवास उनकी गैर-हाजिरी में जिस तरह खाली कराया गया, वह सरकार की लाजवाब कारस्तानी की एक काली नजीर के रूप में ही सामने आई है। भारी पुलिस और पीएसी बल लगाकर जिस तरह मकान को घेरने के बाद सम्पत्ति विभाग के अभियंता, अफसर और अमला लगभग शाम के वक्त घर में घुसा और भारी अफरातफरी मचाते हुए टूट-फूट के साथ घर का सामान बाहर फेंककर मकान को सील किया, उसे बर्बर कार्रवाई के सिवा क्या कहा जा सकता है? सील किए गए मकान में बिजली जल रही है और अगर शॉटसर्किट हो जाए और मकान समेत उसमें बाकी बचा सामान नष्ट हो जाए तो इसकी जवाबदेही किस पर होगी? शासन-प्रशासन के ऊपरी तल से जब अराजकता होती है तो वह हर स्तर पर ही नहीं, नीचे तक जाती है। इसलिए अगर आज अराजकता का ही राज है, तो इसकी वजह खुद समझी जा सकती है। क्या अखबार निकालना गुनाह है? क्या सच्चाई का साथ देना गुनाह है? क्या इस तरह की अराजक कार्रवाई से लोकतंत्रवादियों का मनोबल तोड़ा जा सकता है? ठीक ही लिखा है दुष्यंत कुमार ने-

तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की, मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिए

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