अखिलेश युवा हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई में प्रोफेशनलिज्म का बहुत महत्व रहा है। जिसे जो काम करना है, ठीक से करे, ईमानदारी से करे, निष्ठा से करे, काम को अपना काम समझ कर करे। यही प्रोफेशनल तरीका है। वह कार्यशैली में हाईटेक हो, पर व्यवहार में पारंपरिक हिंदुस्तानी। सबकेप्रति आदर का भाव। अफसरी नहीं। कोई भी किसी दफ्तर में अपना काम लेकर जाय, तो उसका अपनेपन केसाथ स्वागत हो, उसे दुत्कारा न जाय, अफसरी न झाड़ी जाय। आफ्टर आल सभी जनता की सेवा केलिए हैं, कर्मचारी, अफसर और सरकार भी। जनता सबसे ऊपर है, आम आदमी सबसे ज्यादा ध्यान दिये जाने योग्य व्यक्ति है। अखिलेश कुछ ऐसी ही कार्य संस्कृति चाहते हैं। लगे कि सरकार कोई तोप चीज नहीं है, वह जनता केद्वारा, जनता की और जनता केलिए है।
वे जानते हैं कि पूरे तंत्न में पांच साल से एक अजीब तरह की जड़ता और असंवेदनशीलता घर कर गयी है। इसको बदलने के लिए, इसे ज्यादा से ज्यादा जनसंवेदनशील बनाने केलिए स्वयं भी वैसा ही व्यवहार करना पड़ेगा। महात्मा गांधी और डा. राम मनोहर लोहिया का मानना था कि नेता को विशिष्ट नहीं होना चाहिए, उसे जनता से अलग नहीं दिखना चाहिए। आम आदमी जिस तरह का जीवन व्यतीत कर रहा है, वही जीवन नेता को भी अपने लिए चुनना चाहिए, तभी वह व्यापक स्तर पर लोगों के साथ तादात्म्य स्थापित कर सकेगा, तभी वह लोगों की समस्याओं को समझ सकेगा और केवल तभी वह उनकेसमाधान की दिशा में कदम बढ़ा सकेगा। इतिहास गवाह है कि जो नेता जनता से दूर गये, उनको लोगों ने सत्ता से उतार दिया, समय की कब्र में दफ्न कर दिया।
अखिलेश को पता है कि यह फासला नहीं होना चाहिए। इसीलिए वे नयी सरकार की कार्यसंस्कृति में आम जनता को केंद्र में रखकर चल रहे हैं। आप को याद होगा, पहले जब मुख्यमंत्नी का काफिला सड़क पर निकलता था तो राजशाही अंदाज में। सारी सड़कें बंद हो जाती थीं, जनता जाय भाड़ में। कितना भी जरूरी काम है, रुको और इंतजार करो या फिर ज्यादा उछल-कूद की तो डंडे खाओ। लोग सोचते थे, ये कैसे जनता केनेता हैं, जिनको जनता की तकलीफों का ही ध्यान नहीं है। कई बार लोग गालियाँ भी देते थे। लेकिन अब अखिलेश केसाथ ऐसा नहीं है। कोई ताम-झाम नहीं, कोई काफिला नहीं, किसी को कोई परेशानी नहीं। मुख्यमंत्नी निकल जाते हैं, आम लोगों को पता ही नहीं चलता है, उनका रास्ता नहीं रुकता है, उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती है।
इतना ही नहीं किसी को भी मुख्यमंत्नी से मिलना है तो रास्ते खुले हुए हैं। ज्यादा छानबीन नहीं, रोक-टोक नहीं। कोई अदना से अदना आदमी भी पहुंच सकता है, अपनी बात कह सकता है, अपना दुख बयान कर सकता है। यह मुख्यमंत्नी का नहीं जनता का दरबार है और अपने ही दरबार में आखिर जनता को क्यों कोई दिक्कत होगी। मुख्यमंत्नी की शैली है, लोगों केपास होने की। बहुत सहज हैकि वे अफसरों से भी ऐसी ही उम्मीद करेंगे। जनता ने तो अपना काम कर दिया है, अब सरकार की बारी है। जिस उम्मीद से, जिस सपने से लोगों ने समाजवादी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया है, वे उम्मीदें, वे सपने टूटने नहीं चाहिए। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को मुख्यमंत्नी का यह साफ संदेश है। कोई लिखा हुआ नहीं, उनकेव्यवहार से, उनकी अपनी कार्यशैली से। समय से कार्यालय आइये, जनता की पीड़ा कम करने केलिए जितना कर सकें, करिये।
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Sunday, April 29, 2012
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