क्या बसपा केन्द्र की यूपीए सरकार के लिए संकटमोचक बनेंगी?
महंगाई के मुद्दे पर सम्पूर्ण विपक्ष के कटौती प्रस्ताव के मद्देनजर कांग्रेस सरकार को बचाने के लिए बसपा की शरण में है। बसपा और कांग्रेस में एक गुप्त समझौता हुआ है। इसके संकेत बसपा सुप्रीमो मायावती को आय से अधिक सम्पत्ति मामले में सीबीआई के राहत देने से मिले रहे हैं। कांग्रेसी सशंकित हैं। लोकसभा में बजट सत्र में सम्पूर्ण विपक्ष ने केन्द्र की यूपीए सरकार को कई मुद्दे पर घेरने के लिए एकजुट है। विपक्ष कटौती प्रस्ताव लाने जा रहा है। सभी राजनीतिक दलों ने इसकी तगड़ी रणनीति तैयार की है। विपक्ष के कटौती प्रस्ताव पर बसपा अहम भूमिका निभा सकती है।
बैसाखी पर टिकी यूपीए सरकार ने विपक्ष के कटौती प्रस्ताव से निपटने के लिए बसपा पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं।
इसकी सबसे बड़ी मिसाल सीबीआई ने बसपा सुप्रीमो मायावती को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में राहत देने की घोषणा से मिलती है। एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि केन्द्र की यूपीए सरकार के सामने सम्पूर्ण विपक्ष की एकजुटता ने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। इस संकट से निपटने के लिए कांग्रेस और बसपा के बीच एक गुप्त समझौता हुआ है। इसी समझौते के तहत बसपा को कई मामलों में राहत दी गई है
। पहला कांग्रेस यूपी में ज्यादा हस्तक्षेप नहीं करेगी।
दूसरा बसपा को केन्द्र सरकार सहयोग करेगी।
तीसरा कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष को हटाया जाए।
इसके एवज में बसपा विपक्ष के कटौती प्रस्ताव पर कांग्रेस का साथ देगी। इस पर दोनों दलों के बीच सहमति हो गई है। मालूम हो कि चौदहवीं लोकसभा के कार्यकाल के दौरान अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार के मुद्दे पर बसपा विपक्ष के साथ थी। जबकि सपा कांग्रेस के साथ। लेकिन इस बार तस्वीर बदल गई है। सपा कांग्रेस का सबसे ज्यादा विरोध कर रही है। हाल ही में महिला आरक्षण विधेयक पर राज्यसभा में हुई वोटिंग पर सदन से वाकआउट कर बसपा ने कांग्रेस का साथ दिया था। ।
बहनजी को सीबीआई ने आय से अधिक मामले में राहत से गुप्त समझौते के तहत दी है।
Wednesday, April 28, 2010
Tuesday, April 20, 2010
नेता और नेतृत्व
नेता यानी अप्राकृतिक, अमर्यादित, अपरूप, अपचेष्टा के पर्यावरण के बावजूद उनके समानांतर ही शिव-सत्ता का अवगाहन ।
नेता यानी समग्र सौदर्य का प्रकाशन ।
नेतृत्व का मतलब रचना है । स्वयं को रचना । युग को रचना । समय को रचना । काल को रचना । भूत और वर्तमान की पुनर्ररचना और भविष्य की संरचना । दृष्ट को रचना, अदृश्ट की भी रचना ।
नेतृत्व समानांतर संसार की सर्जना है । नेतृत्व ईश्वर के बाद सर्वोच्च सत्ता को साधने वाली कला है ।
नेतृत्व वही जिसके प्रत्येक शब्द में सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् की ज्योत्सना झरती हो । वहाँ डूब-डूब जाने के लिए मन बरबस खींचा चला आता रहे ।
नेतृत्व सच्चा होगा तो वह क्षीणकाय न होगा, दीर्घायु होगा । वहाँ वाद न होगा, विवाद न होगा, अजस्त्र संवाद होगा ।
फलतः उसमें मनुष्य जाति के लिए अकूत रोशनी होगी । एक ऐसा पनघट होगा जहाँ हर कोई अपनी प्यास बुझा सके । एक सघन-सुगंधित तरूबर होगा जहाँ हर कोई श्रांत श्लथ श्रमजल जूड़ा सकेगा । एक ऐसा निर्मल दरपन होगा जहाँ वह अपने चेहरे के हर रंग को भाँप सकेगा ।
एक ईमानदार नेतृत्व सामयिकता के जाल में उलझना नहीं चाहता । सामयिकता तत्क्षण का अल्प सत्य है । वह शाश्वत नहीं हुआ करती ।
ईमानदार नेता सदैव शाश्वत की ओर उन्मुख होना चाहता है । इसलिए वह व्यक्ति, जाति, धर्म, देश, काल, परिवेश को लांघने के सामर्थ्य से परिपूर्ण होता है । वह अपनी वास्तविकता में व्यक्ति नहीं अपितु व्यक्तित्व की लघुता से प्रभुता की ओर संकेत है ।
नेतृत्व तटस्थ-वृत्ति है । ऐसी तटस्थता जहाँ मंगलकामना का अनवरत् राग गूँजता रहता है-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे भवन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राण पश्यंतु, मां कश्चित् दुख भाग्भवेत् ।
नेता यानी समग्र सौदर्य का प्रकाशन ।
नेतृत्व का मतलब रचना है । स्वयं को रचना । युग को रचना । समय को रचना । काल को रचना । भूत और वर्तमान की पुनर्ररचना और भविष्य की संरचना । दृष्ट को रचना, अदृश्ट की भी रचना ।
नेतृत्व समानांतर संसार की सर्जना है । नेतृत्व ईश्वर के बाद सर्वोच्च सत्ता को साधने वाली कला है ।
नेतृत्व वही जिसके प्रत्येक शब्द में सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् की ज्योत्सना झरती हो । वहाँ डूब-डूब जाने के लिए मन बरबस खींचा चला आता रहे ।
नेतृत्व सच्चा होगा तो वह क्षीणकाय न होगा, दीर्घायु होगा । वहाँ वाद न होगा, विवाद न होगा, अजस्त्र संवाद होगा ।
फलतः उसमें मनुष्य जाति के लिए अकूत रोशनी होगी । एक ऐसा पनघट होगा जहाँ हर कोई अपनी प्यास बुझा सके । एक सघन-सुगंधित तरूबर होगा जहाँ हर कोई श्रांत श्लथ श्रमजल जूड़ा सकेगा । एक ऐसा निर्मल दरपन होगा जहाँ वह अपने चेहरे के हर रंग को भाँप सकेगा ।
एक ईमानदार नेतृत्व सामयिकता के जाल में उलझना नहीं चाहता । सामयिकता तत्क्षण का अल्प सत्य है । वह शाश्वत नहीं हुआ करती ।
ईमानदार नेता सदैव शाश्वत की ओर उन्मुख होना चाहता है । इसलिए वह व्यक्ति, जाति, धर्म, देश, काल, परिवेश को लांघने के सामर्थ्य से परिपूर्ण होता है । वह अपनी वास्तविकता में व्यक्ति नहीं अपितु व्यक्तित्व की लघुता से प्रभुता की ओर संकेत है ।
नेतृत्व तटस्थ-वृत्ति है । ऐसी तटस्थता जहाँ मंगलकामना का अनवरत् राग गूँजता रहता है-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे भवन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राण पश्यंतु, मां कश्चित् दुख भाग्भवेत् ।
Wednesday, April 7, 2010
चुनौती शिक्षा का अधिकार कानून की
एक अप्रैल से भारत में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो गया। प्रधानमंत्री के शब्दों में भारत में नई क्रांति की शुरुआत हो गई। किंतु कानून लागू होने के साथ ही भारत के 18 करोड़ की आबादी वाले राज्य के मुखिया ने घोषित कर दिया कि जब तक इस व्यवस्था का पूरा वित्ताीय भार भारत सरकार वहन नहीं करेगी, तब तक इसे लागू करना असंभव है। उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री को इस तरह की घोषणाएं करने की जल्दी रहती है। सच्चाई यह है कि इस कानून से देश का भाग्य बदल सकता है। खासतौर से उन वर्गो का जिनका प्रतिनिधित्व करने का वह दावा करती हैं। यह दुखद है कि जिस राज्य ने आजादी के बाद इस देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री दिए, आज वह देश के सर्वाधिक पिछड़े राज्यों में है। गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या का अनुपात देश में सर्वाधिक उत्तार प्रदेश में है। शिक्षा के औसत में उत्तार प्रदेश काफी पीछे है।इनके मुताबिक, देश की 65 फीसदी साक्षरता दर के मुकाबले उत्तर प्रदेश की साक्षरता दर 57 फीसदी है। पूरे देश में 92 लाख से ज्यादा बच्चे स्कूल का मुंह नहीं देख पाते, उसमें से अकेले 30 लाख उत्तर प्रदेश से हैं। उत्तर प्रदेश के लिए इस योजना में 18,000 करोड़ रुपये खर्च आयेगा, जिसमें से 10,000 करोड़ केंद्र देगा। सिर्फ 8,000 करोड़ रुपये राज्य सरकार जुटा पाने में असमर्थता जता रही है। इसके विपरीत उत्तरप्रदेश सरकार करीब 4,500 करोड़ रुपये सिर्फ मूर्तियों और स्मारकों पर खर्च कर रही है।
शिक्षा और चिकित्सकीय सुविधा के क्षेत्र में झारखंड, बिहार की तरह उत्तार प्रदेश भी निचले पायदान पर है। उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री की देखादेखी देश के अन्य पिछड़े राज्य भी शिक्षा के अधिकार पर होने वाले खर्च से हाथ खड़े कर सकते हैं। संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को राज्य सूची का विषय बनाया था।जवाहर लाल नेहरू के शासनकाल में शिक्षा में सुधार के लिए डीएस कोठारी कमीशन का गठन किया गया था। इस आयोग ने पड़ोस में ही विद्यालय खोलने और प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य, नि:शुल्क व मातृभाषा में करने की अनुसंशा की। आयोग की अनुसंशाओं को लागू करने के बजाय बड़े पैमाने पर फैंसी स्कूल खुल गए, जिनमें प्रथम कक्षा से ही अंग्रेजी पढ़ाने पर जोर दिया गया। भारत सरकार के सैम पेत्रोदा ज्ञान कमीशन ने दर्जा एक से ही अंग्रेजी की अनिवार्यता पर जोर दिया, जिस पर खीझ कर तत्कालीन शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह ने इसे अज्ञान कमीशन की संज्ञा दी। इसका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा। वह न केवल शास्त्री भवन से बाहर हुए, बल्कि नेहरू परिवार से संबंध रखने वाले जितने भी ट्रस्ट हैं, सभी से चलते कर दिए गए। खानदानी स्वामीभक्ति की दुहाई भी उनके काम न आई। प्रारंभिक शिक्षा को मातृभाषा से दूर रखने में फैंसी स्कूलों का बड़ा योगदान है। इन स्कूलों में नर्सरी में दाखिले को फीस ही लाखों में है। देश के बड़े लोगों में पहले तो अपने बच्चों को इंजीनियरिंग और मेडिकल में प्रवेश कराने की चिंता रहती थी, अब उनमें बच्चे को अच्छे स्कूल में भर्ती कराने की भी होड़ लगी है।
सरकार ने कहा है कि 25 फीसदी गरीब बच्चों का दाखिला नि:शुल्क और अनिवार्य होगा। सरकार अपने इस वचन को कभी पूरा नहीं कर पाएगी। सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले बच्चों में से आधे आठवीं कक्षा तक स्कूल छोड़कर चले जाते हैं। 2008-09 में पूरे देश में प्राइमरी पढ़ाई में एक करोड़ 34 लाख बच्चे दाखिल हुए, किंतु दर्जा छह से आठ के बीच इनमें से कुल 53 लाख ही पहुंचे। दर्जा पांच के बाद एक-तिहाई और आठ के बाद आधे बच्चे स्कूल से बाहर हो जाते हैं। प्राथमिक शिक्षा की दोहरी चुनौती सभी बच्चों को स्कूल भेजना और कम से कम दसवीं तक उन्हें स्कूल से पलायन न करने देना है। क्या देश में राज्य सरकारों ने इतने स्कूल बनाए हैं कि उनमें सभी बच्चों समाहित हो सकें? क्या बने हुए सभी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं? इस कानून की मंशा को पूरा करने के लिए स्थानीय निकायों और स्वयंसेवी संगठनों को कठिन परिश्रम करना होगा। गरीब बच्चों के लिए केवल फीस की माफी नहीं, बल्कि दोपहर का भोजन, वस्त्र, पुस्तक के लिए साधन देना भी अनिवार्य है। ऐसी लड़कियों के लिए, जो घरेलू काम के बोझ से स्कूल नहीं जातीं गांव प्रधान और सभासदों को घरेलू विद्यालय संचालित करने चाहिए, जहां दिन में तीन घंटे की पढ़ाई हो और उन्हें प्राथमिक जानकारी दी जाए। इस अल्पकालिक शिक्षा में आने वाली बच्चियों के लिए कुछ आकर्षक योजनाएं हों।
इस घोषणा को महज खानापूर्ति के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत को ज्ञानवान बनाने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसे भारतीय भाषाओं को समाप्त कर अंग्रेजी थोपने के साधन के रूप में इस्तेमाल न किया जाए। भूखा अभिभावक, भूखा बच्चा, भूखा अध्यापक और जर्जर स्कूल क्या शिक्षा की चुनौती को कबूल कर सकेंगे। संभ्रांत लोगों को स्कूल खोलने से रोक कर सरकारी संस्थाओं को गोद लेने को कहा जाए क्योंकि शिक्षा समाज की सबसे बड़ी सेवा है, उद्योग अथवा व्यवसाय की तरह कमाई का साधन नहीं है।
शिक्षा और चिकित्सकीय सुविधा के क्षेत्र में झारखंड, बिहार की तरह उत्तार प्रदेश भी निचले पायदान पर है। उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री की देखादेखी देश के अन्य पिछड़े राज्य भी शिक्षा के अधिकार पर होने वाले खर्च से हाथ खड़े कर सकते हैं। संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को राज्य सूची का विषय बनाया था।जवाहर लाल नेहरू के शासनकाल में शिक्षा में सुधार के लिए डीएस कोठारी कमीशन का गठन किया गया था। इस आयोग ने पड़ोस में ही विद्यालय खोलने और प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य, नि:शुल्क व मातृभाषा में करने की अनुसंशा की। आयोग की अनुसंशाओं को लागू करने के बजाय बड़े पैमाने पर फैंसी स्कूल खुल गए, जिनमें प्रथम कक्षा से ही अंग्रेजी पढ़ाने पर जोर दिया गया। भारत सरकार के सैम पेत्रोदा ज्ञान कमीशन ने दर्जा एक से ही अंग्रेजी की अनिवार्यता पर जोर दिया, जिस पर खीझ कर तत्कालीन शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह ने इसे अज्ञान कमीशन की संज्ञा दी। इसका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा। वह न केवल शास्त्री भवन से बाहर हुए, बल्कि नेहरू परिवार से संबंध रखने वाले जितने भी ट्रस्ट हैं, सभी से चलते कर दिए गए। खानदानी स्वामीभक्ति की दुहाई भी उनके काम न आई। प्रारंभिक शिक्षा को मातृभाषा से दूर रखने में फैंसी स्कूलों का बड़ा योगदान है। इन स्कूलों में नर्सरी में दाखिले को फीस ही लाखों में है। देश के बड़े लोगों में पहले तो अपने बच्चों को इंजीनियरिंग और मेडिकल में प्रवेश कराने की चिंता रहती थी, अब उनमें बच्चे को अच्छे स्कूल में भर्ती कराने की भी होड़ लगी है।
सरकार ने कहा है कि 25 फीसदी गरीब बच्चों का दाखिला नि:शुल्क और अनिवार्य होगा। सरकार अपने इस वचन को कभी पूरा नहीं कर पाएगी। सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले बच्चों में से आधे आठवीं कक्षा तक स्कूल छोड़कर चले जाते हैं। 2008-09 में पूरे देश में प्राइमरी पढ़ाई में एक करोड़ 34 लाख बच्चे दाखिल हुए, किंतु दर्जा छह से आठ के बीच इनमें से कुल 53 लाख ही पहुंचे। दर्जा पांच के बाद एक-तिहाई और आठ के बाद आधे बच्चे स्कूल से बाहर हो जाते हैं। प्राथमिक शिक्षा की दोहरी चुनौती सभी बच्चों को स्कूल भेजना और कम से कम दसवीं तक उन्हें स्कूल से पलायन न करने देना है। क्या देश में राज्य सरकारों ने इतने स्कूल बनाए हैं कि उनमें सभी बच्चों समाहित हो सकें? क्या बने हुए सभी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं? इस कानून की मंशा को पूरा करने के लिए स्थानीय निकायों और स्वयंसेवी संगठनों को कठिन परिश्रम करना होगा। गरीब बच्चों के लिए केवल फीस की माफी नहीं, बल्कि दोपहर का भोजन, वस्त्र, पुस्तक के लिए साधन देना भी अनिवार्य है। ऐसी लड़कियों के लिए, जो घरेलू काम के बोझ से स्कूल नहीं जातीं गांव प्रधान और सभासदों को घरेलू विद्यालय संचालित करने चाहिए, जहां दिन में तीन घंटे की पढ़ाई हो और उन्हें प्राथमिक जानकारी दी जाए। इस अल्पकालिक शिक्षा में आने वाली बच्चियों के लिए कुछ आकर्षक योजनाएं हों।
इस घोषणा को महज खानापूर्ति के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत को ज्ञानवान बनाने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसे भारतीय भाषाओं को समाप्त कर अंग्रेजी थोपने के साधन के रूप में इस्तेमाल न किया जाए। भूखा अभिभावक, भूखा बच्चा, भूखा अध्यापक और जर्जर स्कूल क्या शिक्षा की चुनौती को कबूल कर सकेंगे। संभ्रांत लोगों को स्कूल खोलने से रोक कर सरकारी संस्थाओं को गोद लेने को कहा जाए क्योंकि शिक्षा समाज की सबसे बड़ी सेवा है, उद्योग अथवा व्यवसाय की तरह कमाई का साधन नहीं है।
Tuesday, March 30, 2010
गुड़ खाएं और गुलगुले से परहेज
जहां संस्कार में अतिथि देवो भव शामिल हो, वहां कांग्रेस और कांग्रेसी सरकारें अमिताभ बच्च्न और उनके परिवार के साथ जिस तरह का क्षुद्र व्यवहार कर रही हैं वह शर्मिंदा करने वाला है। क्या कांग्रेसियों का धर्म – कर्म सिर्फ एक परिवार को खुश रखना भर रह गया है? येसा लगता है देश कांग्रेस का हो गया है और कांग्रेस निजी तौर पर सोनिया गांधी की। व्यक्तिगत पसंद – नापसंद सत्ता दल का सरकारी एजेंडा नहीं हो सकता। इमरजेंसी का दौर बहुतों को अभी याद होगा जब कांग्रेस के चंद चाटुकारों ने इंदिरा इज इंडिया का नारा देकर इंदिरा गांधी जैसी तेजवान, शक्तिशाली व दूरदर्शी नेता का बंटाधार करके रख दिया था। सोनिया को येसी चाटुकारिता से बचना चाहिए।
अमिताभ का कुसूर क्या है? मुंबई में नवनिर्मित सी-लिंक के उद्घाटन समारोह में वह खुद ब खुद नहीं गए, एनसीपी के बुलावे पर अतिथि बने थे। उस समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण भी पहुंचे। समारोह का बकायदा सरकारी निमंत्रण पत्र छपा और बंटा था। यह बात दीगर है कि अपनी सफाई में चव्हाण ने कहा कि उन्हें अगर पता होता कि अमिताभ आ रहे हैं वह समारोह में नहीं जाते। यह एक अलग मुद्दा हो सकता है कि जिस समारोह में मुख्यमंत्री जा रहे हों उसमे कौन मुख्य अतिथि है कैसे पता नहीं चला, वह भी तब जबकि आयोजन सहयोगी दल एनसीपी का था।
गठबंधन की सरकार क्या इसी तरह काम करती हैं? यह तो वही हुआ कि गुड़ खाएं और गुलगुले से परहेज । एनसीपी के साथ सत्ता की मलाई खाने में कांग्रेस को एतराज नहीं लेकिन उसके मान्य अतिथि (अमिताभ) मंजूर नहीं। तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद एनसीपी इसलिए प्रिय है क्योंकि उसके बिना कांग्रेस को महाराष्ट्र की सत्ता से दूर रहना पड़ेगा। मीठा-मीठा गप्प वाली ही बात है, वरना बात ज्यादा पुरानी नहीं, शरद पवार ने कांग्रेस क्यों छोड़ी या तोड़ी थी? सोनिया के विदेशी मूल के सवाल पर किसने विरोध का झंडा उठाया था? माना राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती, मौका और लाभ के प्रतिशत के अनुसार रिश्ते बनते व बिगड़ते हैं।
आज महंगाई के कारण पूरे देश में संप्रग सरकार की छीछालेदर हो रही है फिर भी पवार प्रेम सत्ता की अनिवार्य शर्त बना हुआ है। एनसीपी की देखिए, उसी ने अमिताभ को सी-लिंक के समारोह में निमंत्रित किया और विवाद होने पर एक सामान्य सा बयान (व्यर्थ का विवाद) देकर वह चुप बैठ गई। कम से कम उसे तो मुंबतोड़ जवाब देना था, हां हमने बुलाया था और हमारे अतिथि को अपमानित करने का कांग्रेस कोई हक नहीं रखती। अशोक चव्हाण तो कुरसी को लेकर इतने सहमे कि मराठी विद्वानों के पुणे वाले समारोह में एक दिन पहले ही हाजिरी लगाने पहुंच गए ताकि फिर बिग-बी के साथ मंच साझा करने का लांछन न सहना पड़े।
शीला दीक्षित को क्या हो गया? दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री हैं और यादाश्त इतनी कमजोर कि १० मार्च का समारोह भी भूल गईं जिसमें वह छोटे बच्चन अभिषेक के साथ मंच पर बैठी थीं। इसी समारोह में उन्होंने अभिषेक को अर्थ आवर का ब्रांड अंबेसडर घोषित किया था और शनिवार की रात जब इंडिया गेट पर अर्थ आवर मनाया गया तो अभिषेक को वहां आने से रोक दिया गया। वीडियो से उनके फुटेज हटवा दिए गए, अति उत्साह में या शीला दीक्षित को खुश करने के लिए आयोजकों ने वे पोस्टर तक फाड़ डाले जिनमें अभिषेक थे। राजनीतिक मतभेद और विरोध तो समझ में आता है लेकिन सरकार इसका क्या तर्क देगी?
पता नहीं १० मार्च के फोटो पर गांधी परिवार की नजर पड़ी थी या नहीं जिसमें दिल्ली की पर्यावरण प्रेमी मुख्यमंत्री प्रफुल्लित होकर अभिषेक के साथ मंच पर विराजमान थीं। अब वह इतना कहकर हाथ झाड़ लेती हैं कि समारोह के इंतजाम की जानकारी उन्हें नहीं। क्या बुढ़ापे में सचमुच यादाश्त कमजोर पड़ने लगती है?
राजनीति के रंग देखें, अमर सिंह एक समय कांग्रेस से अधिक सोनिया के आलोचक रहे। एटमी डील पर जब पहली संप्रग सरकार खतरे में पड़ी तो वही मुलायम को कांग्रेस के करीब लाने का सूत्रधार बने। अमर सिंह जो अमिताभ के सबसे नजदीकी राजनीतिक व पारिवारिक मित्र थे और संबंध बड़े-छोटे भाई का था, आज नई राजनीतिक जमीन की तलाश में सुबह-शाम सोनिया – राहुल चालीसा का पाठ कर रहे हैं और इस मुहिम में बच्चन परिवार कहीं पीछे छूट गया। *
क्या अमिताभ का पक्ष साधने पर कांग्रेस की राह उनके लिए कठिन हो सकती है? भाजपा ने जरूर पक्ष लिया है। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने भी समर्थन में आवाज उठाई है जिनका उत्तर भारतीयों पर हमले के मुद्दे पर अमिताभ से मतभेद हो गया था। यह जानते हुए भी कि कांग्रेस नहीं सुनेगी, भारतीय ओलंपिक संघ के उपाध्यक्ष वरिष्ठ विजय मल्होत्रा ने बिग-बी को राष्ट्रकुल खेलों का ब्रांड अंबेसडर बनाने की मांग कर डाली है।
महत्वपूर्ण यह कि कांग्रेसी सरकारों द्वारा बच्चन परिवार का अघोषित बहिष्कार के लगातार प्रयासों के बीच हाईकमान सोनिया गांधी चुप हैं। पारिवारिक मतभेद (अगर कोई हो) से ऊपर उठकर कम से कम उन्हें इतना जरूर कहना चाहिए जो हो रहा वह ठीक नहीं। आखिर यह वही परिवार है जिसे राजनीति में उतारने का पहला श्रेय स्व. राजीव गांधी को जाता है.
अमिताभ का कुसूर क्या है? मुंबई में नवनिर्मित सी-लिंक के उद्घाटन समारोह में वह खुद ब खुद नहीं गए, एनसीपी के बुलावे पर अतिथि बने थे। उस समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण भी पहुंचे। समारोह का बकायदा सरकारी निमंत्रण पत्र छपा और बंटा था। यह बात दीगर है कि अपनी सफाई में चव्हाण ने कहा कि उन्हें अगर पता होता कि अमिताभ आ रहे हैं वह समारोह में नहीं जाते। यह एक अलग मुद्दा हो सकता है कि जिस समारोह में मुख्यमंत्री जा रहे हों उसमे कौन मुख्य अतिथि है कैसे पता नहीं चला, वह भी तब जबकि आयोजन सहयोगी दल एनसीपी का था।
गठबंधन की सरकार क्या इसी तरह काम करती हैं? यह तो वही हुआ कि गुड़ खाएं और गुलगुले से परहेज । एनसीपी के साथ सत्ता की मलाई खाने में कांग्रेस को एतराज नहीं लेकिन उसके मान्य अतिथि (अमिताभ) मंजूर नहीं। तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद एनसीपी इसलिए प्रिय है क्योंकि उसके बिना कांग्रेस को महाराष्ट्र की सत्ता से दूर रहना पड़ेगा। मीठा-मीठा गप्प वाली ही बात है, वरना बात ज्यादा पुरानी नहीं, शरद पवार ने कांग्रेस क्यों छोड़ी या तोड़ी थी? सोनिया के विदेशी मूल के सवाल पर किसने विरोध का झंडा उठाया था? माना राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती, मौका और लाभ के प्रतिशत के अनुसार रिश्ते बनते व बिगड़ते हैं।
आज महंगाई के कारण पूरे देश में संप्रग सरकार की छीछालेदर हो रही है फिर भी पवार प्रेम सत्ता की अनिवार्य शर्त बना हुआ है। एनसीपी की देखिए, उसी ने अमिताभ को सी-लिंक के समारोह में निमंत्रित किया और विवाद होने पर एक सामान्य सा बयान (व्यर्थ का विवाद) देकर वह चुप बैठ गई। कम से कम उसे तो मुंबतोड़ जवाब देना था, हां हमने बुलाया था और हमारे अतिथि को अपमानित करने का कांग्रेस कोई हक नहीं रखती। अशोक चव्हाण तो कुरसी को लेकर इतने सहमे कि मराठी विद्वानों के पुणे वाले समारोह में एक दिन पहले ही हाजिरी लगाने पहुंच गए ताकि फिर बिग-बी के साथ मंच साझा करने का लांछन न सहना पड़े।
शीला दीक्षित को क्या हो गया? दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री हैं और यादाश्त इतनी कमजोर कि १० मार्च का समारोह भी भूल गईं जिसमें वह छोटे बच्चन अभिषेक के साथ मंच पर बैठी थीं। इसी समारोह में उन्होंने अभिषेक को अर्थ आवर का ब्रांड अंबेसडर घोषित किया था और शनिवार की रात जब इंडिया गेट पर अर्थ आवर मनाया गया तो अभिषेक को वहां आने से रोक दिया गया। वीडियो से उनके फुटेज हटवा दिए गए, अति उत्साह में या शीला दीक्षित को खुश करने के लिए आयोजकों ने वे पोस्टर तक फाड़ डाले जिनमें अभिषेक थे। राजनीतिक मतभेद और विरोध तो समझ में आता है लेकिन सरकार इसका क्या तर्क देगी?
पता नहीं १० मार्च के फोटो पर गांधी परिवार की नजर पड़ी थी या नहीं जिसमें दिल्ली की पर्यावरण प्रेमी मुख्यमंत्री प्रफुल्लित होकर अभिषेक के साथ मंच पर विराजमान थीं। अब वह इतना कहकर हाथ झाड़ लेती हैं कि समारोह के इंतजाम की जानकारी उन्हें नहीं। क्या बुढ़ापे में सचमुच यादाश्त कमजोर पड़ने लगती है?
राजनीति के रंग देखें, अमर सिंह एक समय कांग्रेस से अधिक सोनिया के आलोचक रहे। एटमी डील पर जब पहली संप्रग सरकार खतरे में पड़ी तो वही मुलायम को कांग्रेस के करीब लाने का सूत्रधार बने। अमर सिंह जो अमिताभ के सबसे नजदीकी राजनीतिक व पारिवारिक मित्र थे और संबंध बड़े-छोटे भाई का था, आज नई राजनीतिक जमीन की तलाश में सुबह-शाम सोनिया – राहुल चालीसा का पाठ कर रहे हैं और इस मुहिम में बच्चन परिवार कहीं पीछे छूट गया। *
क्या अमिताभ का पक्ष साधने पर कांग्रेस की राह उनके लिए कठिन हो सकती है? भाजपा ने जरूर पक्ष लिया है। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने भी समर्थन में आवाज उठाई है जिनका उत्तर भारतीयों पर हमले के मुद्दे पर अमिताभ से मतभेद हो गया था। यह जानते हुए भी कि कांग्रेस नहीं सुनेगी, भारतीय ओलंपिक संघ के उपाध्यक्ष वरिष्ठ विजय मल्होत्रा ने बिग-बी को राष्ट्रकुल खेलों का ब्रांड अंबेसडर बनाने की मांग कर डाली है।
महत्वपूर्ण यह कि कांग्रेसी सरकारों द्वारा बच्चन परिवार का अघोषित बहिष्कार के लगातार प्रयासों के बीच हाईकमान सोनिया गांधी चुप हैं। पारिवारिक मतभेद (अगर कोई हो) से ऊपर उठकर कम से कम उन्हें इतना जरूर कहना चाहिए जो हो रहा वह ठीक नहीं। आखिर यह वही परिवार है जिसे राजनीति में उतारने का पहला श्रेय स्व. राजीव गांधी को जाता है.
Saturday, March 20, 2010
मायावती का मानसिक दिवालियापन
उत्तर प्रदेश में दलित भले ही भूखे मर रहा हो, लेकिन खुद को दलितों का मसीहा बताने वाली मायावती एक हजार रुपये के नोटों की माला पहन रही हैं। प्रदेश में दलितों को रहने के लिए ठीक ढंग से झोपड़े भी नसीब नहीं, लेकिन मायावती सरकार ने हजारों करोड़ रुपये बुतों पर पानी की तरह बहा दिए। माया का मनोविज्ञान उस वक्त और भी ज्यादा जटिल दिखाई देता है, जब वह गहनों से लदकर अपने जन्मदिन का केक काटती हैं। इतना ही नहीं, कुछ समय पहले तक तो उनके जन्मदिन पर खुलेआम वसूली भी की जाती थी।
मायावती का कहना है कि यह किस संविधान में लिखा है कि जीवित व्यक्ति की मूर्तिया नहीं लग सकतीं। मायावती जी, अपनी मूर्ति लगाना संवैधानिक तौर पर गलत नहीं है, लेकिन अगर बात नैतिकता या सामाजिक परंपराओं की हो तो इस पर सवाल उठना लाजिमी है। आप किसी पार्क या चौराहे पर जीते जी अपने बुत लगवा सकती हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आप लोगों को इस बात के लिए मजबूर कर सकती हैं कि वे इन बुतों के प्रति श्रद्धा-भाव रखें। दरअसल, किसी की भी मूर्ति या बुतों के प्रति आम लोगों के मन में कोई भावना तभी जन्म लेती है, जब उसने अपने कर्मो से जनमानस के सामने एक मिसाल पेश की हो।
अब आते है आंकड़ो पर, संयुक्त राष्ट्र की विश्व सामाजिक स्थिति 2010 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में दलितों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। प्रति हजार दलित बच्चों में 83 शिशु जन्म लेते ही मर जाते हैं और 119 बच्चों की मौत पाच वर्ष के भीतर ही हो जाती है। दलित आवश्यक वस्तुओं के उपभोग खर्च में सामान्य लोगों के उपभोग खर्च से 42 फीसदी पीछे हैं। उत्तर प्रदेश में हालात और भी ज्यादा बदतर हैं। दलित राजनीति के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले मायावती जैसे नेता दरअसल समाज के इस तबके को वोट बैंक की तरह ही इस्तेमाल करते हैं। उत्तर प्रदेश में दलित या गरीब तबके के उत्थान के लिए मायावती सरकार की तरफ से कोई बड़ी पहल नहीं की गई। दरअसल, एक डर यह भी है कि अगर दबे-कुचले लोग पूरी तरह जागरूक हो गए, तब माया की असली माया से वे भी पूरी तरह वाकिफ हो जाएंगे। उत्तर प्रदेश में दलित महिला का बलात्कार होता है तो अपराधी को पकड़ने के बजाय पीड़ित महिला को मुआवजा बाटा जाता है। प्रदेश में कई आंबेडकर गाव घोषित कर दिए गए हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते इन गावों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है।
राजधानी लखनऊ में बड़े-बड़े पार्को पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन आज भी उत्तर प्रदेश के कई गाव या कस्बों में पुरुष या महिलाओं को शौच के लिए बाहर ही जाना पड़ता है। समाज के दलित और कमजोर तबके को भी अब यह एहसास होने लगा है कि वोट बैंक के नाम पर दलित राजनीति का झडा उठाने वाले लोगों ने भी उनकी तरक्की या विकास के लिए कुछ नहीं किया।
काशीराम के जन्मदिन और बहुजन समाज पार्टी के 25 साल पूरे होने पर मायावती ने लखनऊ में महारैली का आयोजन कर डाला, जिसमें हर राजनीतिक पार्टी की रैलियों की तरह भीड़ जुटाने के लिए पूरे तंत्र को लगा दिया गया था। वातानुकूलित बसों और रेलगाड़ियों से लोगों को प्रदेश की राजधानी लखनऊ लेकर आया गया। अब एक बार बात फिर माया के मनोविज्ञान की। खिसकता जनाधार और काठ की हाडी बन चुके दलित वोट बैंक ने मायवती के मनोविज्ञान को झकझोर दिया है और अब लोगों की भीड़ जुटाकर वह खुद को तसल्ली देने की कोशिश में लगी हैं कि प्रदेश की जनता उनके साथ है। मायावती का यही मनोविज्ञान उनसे ऐसा कुछ कराता है, जो उनके इर्द-गिर्द मौजूद लोगों को भी सहज और स्वाभाविक नहीं लगता, लेकिन सबसे बड़ा डर यही कि बिल्ली के गले में घटी कौन बाधे और अगर ऐसा कुछ करने से ही सत्ता का सुख नसीब हो रहा हो तो फिर इस पर सवाल क्यों उठाए जाएं? आचार्य रजनीश की एक किताब में यह जिक्र था कि अगर बाजार में कोई शख्स अकड़कर चल रहा हो और वह आप से आकर टकरा जाए तो आप उस पर नाराज मत होना, क्योंकि वह शख्स समाज और परिवार में उपेक्षित है और वह लोगों का ध्यान खींचने के लिए इस तरह की हरकतें कर रहा है। ऐसा व्यक्ति गुस्से का नहीं, दया का पात्र है। समाज-सुधार और दलित उत्थान की बात करने वाले ऐसे नेताओं की कमी नहीं, जो लोगों का ध्यान खींचने के लिए कुछ ऐसा ही करते नजर आते हैं।
मायावती का कहना है कि यह किस संविधान में लिखा है कि जीवित व्यक्ति की मूर्तिया नहीं लग सकतीं। मायावती जी, अपनी मूर्ति लगाना संवैधानिक तौर पर गलत नहीं है, लेकिन अगर बात नैतिकता या सामाजिक परंपराओं की हो तो इस पर सवाल उठना लाजिमी है। आप किसी पार्क या चौराहे पर जीते जी अपने बुत लगवा सकती हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आप लोगों को इस बात के लिए मजबूर कर सकती हैं कि वे इन बुतों के प्रति श्रद्धा-भाव रखें। दरअसल, किसी की भी मूर्ति या बुतों के प्रति आम लोगों के मन में कोई भावना तभी जन्म लेती है, जब उसने अपने कर्मो से जनमानस के सामने एक मिसाल पेश की हो।
अब आते है आंकड़ो पर, संयुक्त राष्ट्र की विश्व सामाजिक स्थिति 2010 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में दलितों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। प्रति हजार दलित बच्चों में 83 शिशु जन्म लेते ही मर जाते हैं और 119 बच्चों की मौत पाच वर्ष के भीतर ही हो जाती है। दलित आवश्यक वस्तुओं के उपभोग खर्च में सामान्य लोगों के उपभोग खर्च से 42 फीसदी पीछे हैं। उत्तर प्रदेश में हालात और भी ज्यादा बदतर हैं। दलित राजनीति के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले मायावती जैसे नेता दरअसल समाज के इस तबके को वोट बैंक की तरह ही इस्तेमाल करते हैं। उत्तर प्रदेश में दलित या गरीब तबके के उत्थान के लिए मायावती सरकार की तरफ से कोई बड़ी पहल नहीं की गई। दरअसल, एक डर यह भी है कि अगर दबे-कुचले लोग पूरी तरह जागरूक हो गए, तब माया की असली माया से वे भी पूरी तरह वाकिफ हो जाएंगे। उत्तर प्रदेश में दलित महिला का बलात्कार होता है तो अपराधी को पकड़ने के बजाय पीड़ित महिला को मुआवजा बाटा जाता है। प्रदेश में कई आंबेडकर गाव घोषित कर दिए गए हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते इन गावों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है।
राजधानी लखनऊ में बड़े-बड़े पार्को पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन आज भी उत्तर प्रदेश के कई गाव या कस्बों में पुरुष या महिलाओं को शौच के लिए बाहर ही जाना पड़ता है। समाज के दलित और कमजोर तबके को भी अब यह एहसास होने लगा है कि वोट बैंक के नाम पर दलित राजनीति का झडा उठाने वाले लोगों ने भी उनकी तरक्की या विकास के लिए कुछ नहीं किया।
काशीराम के जन्मदिन और बहुजन समाज पार्टी के 25 साल पूरे होने पर मायावती ने लखनऊ में महारैली का आयोजन कर डाला, जिसमें हर राजनीतिक पार्टी की रैलियों की तरह भीड़ जुटाने के लिए पूरे तंत्र को लगा दिया गया था। वातानुकूलित बसों और रेलगाड़ियों से लोगों को प्रदेश की राजधानी लखनऊ लेकर आया गया। अब एक बार बात फिर माया के मनोविज्ञान की। खिसकता जनाधार और काठ की हाडी बन चुके दलित वोट बैंक ने मायवती के मनोविज्ञान को झकझोर दिया है और अब लोगों की भीड़ जुटाकर वह खुद को तसल्ली देने की कोशिश में लगी हैं कि प्रदेश की जनता उनके साथ है। मायावती का यही मनोविज्ञान उनसे ऐसा कुछ कराता है, जो उनके इर्द-गिर्द मौजूद लोगों को भी सहज और स्वाभाविक नहीं लगता, लेकिन सबसे बड़ा डर यही कि बिल्ली के गले में घटी कौन बाधे और अगर ऐसा कुछ करने से ही सत्ता का सुख नसीब हो रहा हो तो फिर इस पर सवाल क्यों उठाए जाएं? आचार्य रजनीश की एक किताब में यह जिक्र था कि अगर बाजार में कोई शख्स अकड़कर चल रहा हो और वह आप से आकर टकरा जाए तो आप उस पर नाराज मत होना, क्योंकि वह शख्स समाज और परिवार में उपेक्षित है और वह लोगों का ध्यान खींचने के लिए इस तरह की हरकतें कर रहा है। ऐसा व्यक्ति गुस्से का नहीं, दया का पात्र है। समाज-सुधार और दलित उत्थान की बात करने वाले ऐसे नेताओं की कमी नहीं, जो लोगों का ध्यान खींचने के लिए कुछ ऐसा ही करते नजर आते हैं।
Wednesday, March 17, 2010


कौन सा ऐसा इंसान होगा जिसकी आँखे में ये दृश्य देखकर पानी न उतर आये,सिवाय उसके जिसके आँखों का पानी सूख चूका हो या जो आज तक माँ बना इ का या फिर कुपोषण का दर्द न जानते हो, ये दृश्य है उस प्रदेश की बदहाली का जिस प्रदेश की महिला मुख्यमंत्री करोडो की माला पहनकर इठलाती है, जो भारत की सबसे ज्यादा कमानेवाली महिला बन चुकी है और जिसके चमचे और वफादार नस्ल की सरकारी मशीनरी दो दिन के अपने व्यक्तिगत, निजी आयोजन पर जनता के 250 करोड़ फूक डालते है,
ये दृश्य है उस प्रदेश का जहा की मुख्यमंत्री , सदियों से दबे कुचले , दलित और कुपोषित का नाम लेकर सत्ता में आयी और आज उन्ही का खून चूस कर उन्हे इस हालत पंहुचा दिया..ये दो दृश्य दिखाते है की आज क्या हालत कर दी है एक महिला की मुर्खता और उसके चाटुकारों की दौलत की हवस ने,
ये सिर्फ एक कुपोषित बच्चा नहीं है, बल्कि एक कुपोषित लोकतंत्र है, जो ऐसी जाहिल, निकम्मी और जोंक सरकार को सत्ता में बैठा देती है ; जो जवाब मांगने पर लाठिय और गोलिया चलवाती है, जिसके लिए मुर्तिया जिन्दा इंसानों से ज्यादा महत्वपूर्ण है और जो अपने निचे से फिसलती हुई सत्ता को देख रही है
मायावती की बहुप्रचारित राष्ट्रीय रैली पूरी तरह से फ्लाप हो गयी है. मायावती के समर्थकों ने दावा किया था कि रैली में 20 से 25 लाख लोग आ सकते हैं लेकिन रैली में पांच से छह लाख लोग ही आ सके. इसमें भी उत्तर प्रदेश से ज्यादा लोग महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से आये. खबर है कि मायावती ने इस असफलता का संज्ञान लेते हुए समीक्षा करने का फैसला किया है रैली के आयोजन पर ही 200 से 250 करोड़ रूपये खर्च किये गये. रमाबाई अंबेडकर पार्क में आयोजन स्थल पर किये गये खर्च के अलावा परिवहन और प्रचार पर भी जमकर खर्च किया गया. मायावती प्रशासन द्वारा रैली को सफल बनाने के लिए पूरे प्रदेश को पंगु बना दिया गया था. सारे रास्ते रमाबाई अंबेडकर पार्क की ओर ही मोड़ दिये गये थे लेकिन आनेवालों की उदासी ने मायावती को मायूस कर दिया होगा.
"मनी, मीडिया और माफिया से सावधान" कहे वाली मायावती से ये पूंछो की गले में पड़ा १००० के नोटों का हार क्या मणि नहीं है और पार्टी में कितने माफिया हैं | सूप बोले सूप बोले चलनी क्या बोले जिसमे ७२ छेद.
ये रैली का फ्लॉप होना सिर्फ रैली का फ्लॉप होना नहीं है, ये फ्लॉप होना है मायामुर्ती की महत्वाकान्छाओं के, उनके प्रधानमंत्री बना इ के सपने का, उसकी जनता की खून छोस कर रैली और जन्मदिन मानाने वाली नीतियों का.
ये फ्लॉप होना है उस सरकारी बेशर्मी, उस सरकारी गुंडा गर्दी का की केंद्र के पैसे से बनाये गए पूल का उद्घाटन एक गुंडा मंत्री कर देता है, जो अलीगढ में लड़ते मरते , हिन्दू मुस्लिमो को समझाने उनकी समस्या को दूर करने के बजाय अपने रैली में सरकारी मचिनारी को घुलाम बनाए का .. ये फ्लॉप होना है उस मानसिकता का जो वोटर्स को अपना मानसिक गुलाम समझ लेती है.
ये फ्लॉप होना है लोकतंत्र की हत्यारी सरकार का, ये फ्लॉप होना है नकली सोशल इंजिनीअरिंग का, और सबसे बड़ी और अच्छी बात ,ये फ्लॉप होना है उत्तर प्रदेश के दुर्भाग्य का.
Tuesday, March 2, 2010
तांडव हाथी और 'हाथी' की सवारी कर रहे नेताओं का
आखिरकार उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार ने मेरठ में हाथी के तांडव पर तुरंत कार्रवाई करते हुए निर्णय कर लिया कि अब भीड़-भाड़ वाली जगहों पर हाथी को ले जाना कानूनन जुर्म होगा. मायावती प्रशासन का यह फैसला मेरठ की उस घटना के बाद आया है जिसमें एक शादी के दौरान हाथी ने जमकर उत्पात मचाया था. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मतवाला हाथी जिन दो लोगों को िरश्ते में बांधने की बघाई देने आया था वे दोनों भी सत्ता के हाथी पर सवार हैं? उनके मद को कौन चूर करेगा?
'हाथी' की सवारी कर रहे दो नेताओं ने राजनीति के साथ ही आपस में रिश्तेदार बनने का फैसला लिया। 24 फरवरी को बसपा के सांसद कादिर राणा के बेटे और वरिष्ठ बसपा नेता मुनकाद अली की बेटी की शादी की रस्म मेरठ के एक बड़े रिसोर्ट में पूरी की जा रही थीं। हालांकि इस्लाम में शादी की रस्म इतनी छोटी होती है कि उसे पांच आदमियों के बीच मात्र आधा घंटे में ही निपटाया जा सकता है। लेकिन दोनों नेतओं ने इतना आडम्बर किया कि मेरठ में दो दिन तक अफरा-तफरी का माहौल रहा। शादी में इतने लोगों ने शिरकत की कि मेरठ-दिल्ली रोड पर यातायात रोक दिया गया। मीलों लम्बा जाम लगा। जाम में फंसे लोग त्राहि-त्राहि कर बैठे। लोगों ने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि आम आदमी की नुमाइन्दगी करने का दावा करने वाले नेता ही अपनी शान-ओ-शौकत दिखाने के लिए आम आदमी को परेशानी में डाल दें ?
क्या इन्हें यह नहीं पता कि जाम में फंसे लोगों को कितना कष्ट होता है ? बच्चे प्यास से बिलबिला जाते हैं। मरीज वक्त पर अपनी दवा नहीं ले सकता। शहर में आने के बाद दूर-दराज जाने वालों के लिए वाहन उपलब्ध नहीं हो पाता। किसी युवा का इंटरव्यू छूट जाता है। क्योंकि सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं के बच्चों की शादी थी इसलिए पूरा प्रशासन व्यवस्था में जुटा हुआ था। बात यहीं खत्म हो जाती तो भी गनीमत थी। मुनकाद अली ने शादी की रस्म को भी चापलूसी का जरिया बना दिया। क्योंकि मायावती लखनउ में जगह-जगह हाथियों की मूर्तियां स्थापित कर रहीं हैं, शायद इसी से प्रेरणा लेकर मुनकाद अली ने 11 जीते-जागते हाथियों को ही शादी स्थल पर खड़ा करके चापलूसी की एक महान मिसाल पेश कर दी।
बात यहीं खत्म हो जाती तो फिर भी ठीक था। एक हाथी सुबह से भूखा था। हाथी को शायद या तो यह बुरा लगा कि सब इंसान तो लजीज खानों का मजा ले रहे हैं, लेकिन मुझ बेजुबान जानवर को सुबह से भूखा रखा हुआ है। और शायद यह बुरा लगा कि एक गरीब मुल्क के अमीर नेता कैसे शाही शादियों पर बेशुमार दौलत खर्च करके गरीबों के नमक पर छिड़क रहे हैं। शायद यह बुरा लगा हो कि 'सरकार' भी इन्हीं नेताओं की जी-हजूरी में लगी हुई है। तभी तो जैसे ही एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की गाड़ी हूटर बजाती हुई शादी स्थल पर आयी, हाथी के सब्र का बांध टूट गया। हाथी ऐसा बिफरा की उसने उत्पात मचाना शुरु कर दिया। कई दर्जन आलीशान गाड़ियों को अपने पैरों तले कुचल डाला। सूंड से उठाकर गाड़ियों को सड़क पर पटक दिया। चारों ओर अफरा तफरी मच गयी।
यह हाथी शायद मानवतावादी था, इसलिए उसने इंसानों को नुकसान नहीं पहुंचाया। हाथी अगले दिन तक काबू में नहीं आया। दिल्ली और लखनऊ से हाथी को काबू में करने के लिए विशेषज्ञ बुलाए गए, तब कहीं जाकर हाथी के उत्पात को रोका जा सका।
हादसे के बाद जिस तरह की शर्मनाक बातें हुईं, उन्हें सुन और देखकर पक्का यकीन हुआ कि नेताओं का नैतिक पतन ही नहीं हुआ है, बल्कि वे मुंह तक 'कीचड़' में धंस चुके हैं। इस कीचड़ में कादिर राणा और मुनकाद अली जैसे नेता इतने लिथड़ चुके हैं कि उनका चेहरा ही पहचान में नहीं आता। दावा वे आम आदमी की सेवा का करते हैं लेकिन उनके चेहरों के पीछे सामंती चेहरा छिपा है।
मुनकाद अली ने फरमाया कि 'मैंने तो हाथी को पागल नहीं किया है, जो इसके लिए मैं जिम्म्ेदारी लूं।' यह ठीक है मुनकाद ने हाथी को पागल नहीं किया, लेकिन उनसे यह सवाल तो किया ही जा सकता है कि किस 'पागल' ने उनको हाथियों की नुमाईश लगाने की सलाह दी थी ? हाथियों को लाकर शादी की कौनसी रस्म अदा की जा रही थी ? अब क्योंकि मामला सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं का था, इसलिए मुनकाद अली को शासन-प्रशासन ने भी कुछ नहीं कहा।
और अब शुरुआत होती है शासन और प्रशासन के , इन दोनों महानुभाव नेताओं के और दलित और आम जनता के हित के नाम पर सत्ता माँ आयी माया सरकार के सबसे घृणित चेहरे की, जिस पर थूकने का दिल करता है..यहां हाथी के मालिक को ही पकड़कर जेल भेज दिया गया। थाने में जो एफआईआर लिखायी गयी है, उसमें इस बात का जिक्र नहीं है कि हाथी वहां क्यों आया था? किसने बुलाया था ? यहां भी गरीब मार ही पड़ी। यह उस सरकार की हरकतें हैं, जो अपने आप को 'दलित' की सरकार कहती है।
'दलित' सरकार के नेताओं ने सामंतों को भी पीछे छोड़ दिया है। सच तो यह है कि मेरठ में 24 और 25 फरवरी को जो कुछ हुआ, वह एक भूखे हाथी का तांडव नहीं, सत्ता के मद में चूर 'हाथी' का तांडव था। एक भूखे हाथी के तांडव से पूरा शासन-प्रशासन कांप गया था, लेकिन उस दिन को याद करिए, जब देश का 'भूखी जनता' रुपी हाथी तांडव मचाने निकलेगा। तब इन 'सामंती' नेताओं को उस 'हाथी' से कौन बचाएगा ?
'हाथी' की सवारी कर रहे दो नेताओं ने राजनीति के साथ ही आपस में रिश्तेदार बनने का फैसला लिया। 24 फरवरी को बसपा के सांसद कादिर राणा के बेटे और वरिष्ठ बसपा नेता मुनकाद अली की बेटी की शादी की रस्म मेरठ के एक बड़े रिसोर्ट में पूरी की जा रही थीं। हालांकि इस्लाम में शादी की रस्म इतनी छोटी होती है कि उसे पांच आदमियों के बीच मात्र आधा घंटे में ही निपटाया जा सकता है। लेकिन दोनों नेतओं ने इतना आडम्बर किया कि मेरठ में दो दिन तक अफरा-तफरी का माहौल रहा। शादी में इतने लोगों ने शिरकत की कि मेरठ-दिल्ली रोड पर यातायात रोक दिया गया। मीलों लम्बा जाम लगा। जाम में फंसे लोग त्राहि-त्राहि कर बैठे। लोगों ने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि आम आदमी की नुमाइन्दगी करने का दावा करने वाले नेता ही अपनी शान-ओ-शौकत दिखाने के लिए आम आदमी को परेशानी में डाल दें ?
क्या इन्हें यह नहीं पता कि जाम में फंसे लोगों को कितना कष्ट होता है ? बच्चे प्यास से बिलबिला जाते हैं। मरीज वक्त पर अपनी दवा नहीं ले सकता। शहर में आने के बाद दूर-दराज जाने वालों के लिए वाहन उपलब्ध नहीं हो पाता। किसी युवा का इंटरव्यू छूट जाता है। क्योंकि सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं के बच्चों की शादी थी इसलिए पूरा प्रशासन व्यवस्था में जुटा हुआ था। बात यहीं खत्म हो जाती तो भी गनीमत थी। मुनकाद अली ने शादी की रस्म को भी चापलूसी का जरिया बना दिया। क्योंकि मायावती लखनउ में जगह-जगह हाथियों की मूर्तियां स्थापित कर रहीं हैं, शायद इसी से प्रेरणा लेकर मुनकाद अली ने 11 जीते-जागते हाथियों को ही शादी स्थल पर खड़ा करके चापलूसी की एक महान मिसाल पेश कर दी।
बात यहीं खत्म हो जाती तो फिर भी ठीक था। एक हाथी सुबह से भूखा था। हाथी को शायद या तो यह बुरा लगा कि सब इंसान तो लजीज खानों का मजा ले रहे हैं, लेकिन मुझ बेजुबान जानवर को सुबह से भूखा रखा हुआ है। और शायद यह बुरा लगा कि एक गरीब मुल्क के अमीर नेता कैसे शाही शादियों पर बेशुमार दौलत खर्च करके गरीबों के नमक पर छिड़क रहे हैं। शायद यह बुरा लगा हो कि 'सरकार' भी इन्हीं नेताओं की जी-हजूरी में लगी हुई है। तभी तो जैसे ही एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की गाड़ी हूटर बजाती हुई शादी स्थल पर आयी, हाथी के सब्र का बांध टूट गया। हाथी ऐसा बिफरा की उसने उत्पात मचाना शुरु कर दिया। कई दर्जन आलीशान गाड़ियों को अपने पैरों तले कुचल डाला। सूंड से उठाकर गाड़ियों को सड़क पर पटक दिया। चारों ओर अफरा तफरी मच गयी।
यह हाथी शायद मानवतावादी था, इसलिए उसने इंसानों को नुकसान नहीं पहुंचाया। हाथी अगले दिन तक काबू में नहीं आया। दिल्ली और लखनऊ से हाथी को काबू में करने के लिए विशेषज्ञ बुलाए गए, तब कहीं जाकर हाथी के उत्पात को रोका जा सका।
हादसे के बाद जिस तरह की शर्मनाक बातें हुईं, उन्हें सुन और देखकर पक्का यकीन हुआ कि नेताओं का नैतिक पतन ही नहीं हुआ है, बल्कि वे मुंह तक 'कीचड़' में धंस चुके हैं। इस कीचड़ में कादिर राणा और मुनकाद अली जैसे नेता इतने लिथड़ चुके हैं कि उनका चेहरा ही पहचान में नहीं आता। दावा वे आम आदमी की सेवा का करते हैं लेकिन उनके चेहरों के पीछे सामंती चेहरा छिपा है।
मुनकाद अली ने फरमाया कि 'मैंने तो हाथी को पागल नहीं किया है, जो इसके लिए मैं जिम्म्ेदारी लूं।' यह ठीक है मुनकाद ने हाथी को पागल नहीं किया, लेकिन उनसे यह सवाल तो किया ही जा सकता है कि किस 'पागल' ने उनको हाथियों की नुमाईश लगाने की सलाह दी थी ? हाथियों को लाकर शादी की कौनसी रस्म अदा की जा रही थी ? अब क्योंकि मामला सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं का था, इसलिए मुनकाद अली को शासन-प्रशासन ने भी कुछ नहीं कहा।
और अब शुरुआत होती है शासन और प्रशासन के , इन दोनों महानुभाव नेताओं के और दलित और आम जनता के हित के नाम पर सत्ता माँ आयी माया सरकार के सबसे घृणित चेहरे की, जिस पर थूकने का दिल करता है..यहां हाथी के मालिक को ही पकड़कर जेल भेज दिया गया। थाने में जो एफआईआर लिखायी गयी है, उसमें इस बात का जिक्र नहीं है कि हाथी वहां क्यों आया था? किसने बुलाया था ? यहां भी गरीब मार ही पड़ी। यह उस सरकार की हरकतें हैं, जो अपने आप को 'दलित' की सरकार कहती है।
'दलित' सरकार के नेताओं ने सामंतों को भी पीछे छोड़ दिया है। सच तो यह है कि मेरठ में 24 और 25 फरवरी को जो कुछ हुआ, वह एक भूखे हाथी का तांडव नहीं, सत्ता के मद में चूर 'हाथी' का तांडव था। एक भूखे हाथी के तांडव से पूरा शासन-प्रशासन कांप गया था, लेकिन उस दिन को याद करिए, जब देश का 'भूखी जनता' रुपी हाथी तांडव मचाने निकलेगा। तब इन 'सामंती' नेताओं को उस 'हाथी' से कौन बचाएगा ?
Thursday, February 25, 2010
अभी तक आदमी बनकर तुम्हे जीना नहीं आया..........
खुशी हद से बढ़ी तो आ गए मुस्कान को आंसू
कहीं कोई लुटा तो आ गये ईमान को आंसू
चढ़ाकर लूट की संपत्ति तुमनें जीत माँगी तो
पुजारी मुस्कराया आ गये भगवान को आंसू ।
पराई पीर का प्याला तुम्हे पीना नहीं आया
मनुजता का फटा आंचल तुम्हे सीना नहीं आया
भले ही तुम फरिश्तों की तरह बातें करो लेकिन
अभी तक आदमी बनकर तुम्हे जीना नहीं आया।
तुम्हारे पास बल है बुद्धि है विद्वान भी हो तुम
इसे हम मान लेतें हैं बहुत धनवान भी हो तुम
विधाता वैभवों के तुम इसे भी मान लेते हम
मगर यह बात कैसे मान लें इंसान भी हो तुम।
लगा ली गले से नफरत मुहब्बत तक नहीं पहुंचे
बसाया झूठ को दिल में सदाकत तक नहीं पहुंचे
सितारों तक तुम्हारा यह सफर किस काम का जब तुम
अँधेरे में सिसकती आदमियत तक नहीं पहुंचे ।
( रचना - स्व.पंडित रूप नारायण त्रिपाठी जी )
अब दिल भर गया है इन बाबाओं से , माफ़ कीजियेगा ये वो बाबा नहीं जो दाढ़ी मूंछ वाले और अखाड़ो में रहने वाले होते है ये वो बाबा है जो संसद भवन में रहते है, देश के युबराज कहे जाते है, आम आदमी की झोपडी मेक्झाते है लेकिन आम आदमी, दलित बाकि दिन क्या खाता है या इस महंगाई में खली पेट सोता है, इसका ख्याल नहीं आता..
अब तो यही दिमाग में आत है की..
न हयात चाहिए न आफताब चाहिए,
आवाम को तसल्ली नहीं, जवाब चाहिए
जलती आँखे और भूखे पेट कह रह "अजित"
हिंदुस्तान को एक नया इन्कलाब चाहिए
कहीं कोई लुटा तो आ गये ईमान को आंसू
चढ़ाकर लूट की संपत्ति तुमनें जीत माँगी तो
पुजारी मुस्कराया आ गये भगवान को आंसू ।
पराई पीर का प्याला तुम्हे पीना नहीं आया
मनुजता का फटा आंचल तुम्हे सीना नहीं आया
भले ही तुम फरिश्तों की तरह बातें करो लेकिन
अभी तक आदमी बनकर तुम्हे जीना नहीं आया।
तुम्हारे पास बल है बुद्धि है विद्वान भी हो तुम
इसे हम मान लेतें हैं बहुत धनवान भी हो तुम
विधाता वैभवों के तुम इसे भी मान लेते हम
मगर यह बात कैसे मान लें इंसान भी हो तुम।
लगा ली गले से नफरत मुहब्बत तक नहीं पहुंचे
बसाया झूठ को दिल में सदाकत तक नहीं पहुंचे
सितारों तक तुम्हारा यह सफर किस काम का जब तुम
अँधेरे में सिसकती आदमियत तक नहीं पहुंचे ।
( रचना - स्व.पंडित रूप नारायण त्रिपाठी जी )
अब दिल भर गया है इन बाबाओं से , माफ़ कीजियेगा ये वो बाबा नहीं जो दाढ़ी मूंछ वाले और अखाड़ो में रहने वाले होते है ये वो बाबा है जो संसद भवन में रहते है, देश के युबराज कहे जाते है, आम आदमी की झोपडी मेक्झाते है लेकिन आम आदमी, दलित बाकि दिन क्या खाता है या इस महंगाई में खली पेट सोता है, इसका ख्याल नहीं आता..
अब तो यही दिमाग में आत है की..
न हयात चाहिए न आफताब चाहिए,
आवाम को तसल्ली नहीं, जवाब चाहिए
जलती आँखे और भूखे पेट कह रह "अजित"
हिंदुस्तान को एक नया इन्कलाब चाहिए
Monday, February 22, 2010
नक्सलियों का विस्तार
अगर सरकार वाकई में नक्सली समस्या से निपटना चाहती है तो देश के गरीब चालीस करोड़ जनता के हितों को लेकर फैसला ले। नहीं तो नक्सली दिल्ली में भी आकर बैठ जाएंगे। लोगों का जीना हराम है। आमदनी है नहीं खर्चा काफी है। दाल और आटा ही लोगों को नहीं मिलेगा तो वे क्या करेगा। भीख मांगेगा या हथियार उठाएगा। देश में कारपोरेट को अमीर करने की जो नीति मनमोहन सिंह ने बनायी है, उससे देश में स्थिति और भयानक होगी। इस देश में गरीब को रोटी नहीं मिलती। दाल खरीदना जाता है तो कमाई से चार दाने दाल आता है। इलाज करवाने जाता है तो चार दवाई खरीदने के लिए जेब में पैसे नहीं है।सरकार ईमानदारी से गरीबों के हितों में काम करे, नक्सलियों का विस्तार खुद ही रुकेगा।
Tuesday, February 16, 2010
फिल्मी नर-पशु
आपने कभी देखा है, कि जापानी समारोह में सभी चीनी बोलें और जापानी भाषा की हंसी उड़ाएं? या फ्रांस के समारोह में अंग्रेजी बोली जाए और फ्रांसीसी भाषा की खिल्ली उड़ाई जाए? दुनिया का कोई देश अपनी भाषा की उस तरह खिल्ली नहीं उड़ाता जिस तरह भारत के फिल्मोदद्योग से जुड़े व्यक्तियों द्वारा उड़ाया जाता है।
पिछले दिनों हुए “स्टार स्क्रीन अवार्ड” में कुछ ऎसा ही नजार देखा जो किसी भी भारतीय का सिर शरम से झुकाने के लिए काफी था, सिवाय “हिन्दी फिल्मों” से जुड़े लोगों का।
मंच पर साजिद खान “प्रोफेसर परिमल” बन कर शुद्ध हिन्दी बोल रहे थे और उनके साथ खड़ी अभिनेत्री उनकी हिन्दी को कोस रही थीं, अंग्रेजी में। और उनके साथ ठहाके लगा रहे थे दर्शक के रूप में बैठे “हिन्दी” अभिनेता और अभिनेत्रियां।
शर्म की इंतिहा तब हुई जब गायिका श्रेया घोषाल अपना पुरस्कार लेने मंच पर आईं और हिंदी में धन्यवाद-भाषण दोहराने के आग्रह पर ऎसी कठिनाई से, ऎसे अटक-अटक कर दो पंक्तियां हिंदी में बोल गईं जैसे शुद्ध अंग्रेजों की औलाद हैं और हिंदी बोल कर भारतीयों पर एहसान कर रही हैं।
बचपन में राष्ट्रभक्ति की एक कविता पढ़ी थी कि जिसे अपने देश और राष्ट्रीयता पर अभिमान नहीं, वह इंसान नहीं, नर- पशु समान है।
उस फिल्म समारोह में ऎसे ही नरपशु भरे पड़े थे। न पढ़े, न लिखे, दिखावे की ज़िंदगी जीने वाले ये नर-पशु अन्य देशवासियों से अपनी कमतरी छिपाने के लिए विदेशी भाषा का आश्रय लेते हैं।
जरा कस कर एक जूता इनके सिर पर मारें तो चिल्ला पड़ेंगे अपनी मातृभाषा में।
पिछले दिनों हुए “स्टार स्क्रीन अवार्ड” में कुछ ऎसा ही नजार देखा जो किसी भी भारतीय का सिर शरम से झुकाने के लिए काफी था, सिवाय “हिन्दी फिल्मों” से जुड़े लोगों का।
मंच पर साजिद खान “प्रोफेसर परिमल” बन कर शुद्ध हिन्दी बोल रहे थे और उनके साथ खड़ी अभिनेत्री उनकी हिन्दी को कोस रही थीं, अंग्रेजी में। और उनके साथ ठहाके लगा रहे थे दर्शक के रूप में बैठे “हिन्दी” अभिनेता और अभिनेत्रियां।
शर्म की इंतिहा तब हुई जब गायिका श्रेया घोषाल अपना पुरस्कार लेने मंच पर आईं और हिंदी में धन्यवाद-भाषण दोहराने के आग्रह पर ऎसी कठिनाई से, ऎसे अटक-अटक कर दो पंक्तियां हिंदी में बोल गईं जैसे शुद्ध अंग्रेजों की औलाद हैं और हिंदी बोल कर भारतीयों पर एहसान कर रही हैं।
बचपन में राष्ट्रभक्ति की एक कविता पढ़ी थी कि जिसे अपने देश और राष्ट्रीयता पर अभिमान नहीं, वह इंसान नहीं, नर- पशु समान है।
उस फिल्म समारोह में ऎसे ही नरपशु भरे पड़े थे। न पढ़े, न लिखे, दिखावे की ज़िंदगी जीने वाले ये नर-पशु अन्य देशवासियों से अपनी कमतरी छिपाने के लिए विदेशी भाषा का आश्रय लेते हैं।
जरा कस कर एक जूता इनके सिर पर मारें तो चिल्ला पड़ेंगे अपनी मातृभाषा में।
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